पिछले दिनों मंगलोर के एक पब पर कुछ हिंसावादियों द्वारा लड़कियों की पिटाई का मामला आज भारतीय राजनीती और मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है . वास्तव में जो कुछ भी हुआ,उसका तरीका बहुत ही निंदनीय है लेकिन इस घटना ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है "क्या पब संस्कृति भारतीय संस्कृति का अंग है या नही " और भारतीय संस्कृति के सरंक्षण के ठेकेदार कोन है?. सचमुच एक सोचनीय विषय है.
प्रत्येक जन की अपनी अलग अलग राय इस विषय पर देखने और सुनने को मिलती है. कोई इसका पक्षधर है तो किसी के मतानुसार पब संस्कृति बिल्कुल भी भारतीय संस्कृति का अंग नही है. अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न हम लोगों के बीच में उभर कर आया है कि आखिर भारतीय संस्कृति क्या है और इसके सरंक्षण के ठेकेदार कोन है?
आज भारतीय सविधान ने हर किसी को अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का अधिकार दिया हुआ है. सभी लोग कहते है कि ये मेरी लाइफ है जिसे मैं जैसे चाहों उस ढंग से जी सकता हूँ , लेकिन साथ साथ में सविधान ने ये भी कहा है कि आपकी स्वतंत्रा वहा पर ख़तम हो जाती है जहा पर उससे किसी दूसरे को परेशानी का अनुभव होता है. शायद इस विषय पर हमारा ध्यान नही जाता.
अब बात आती है कि क्या पब संस्कृति को भारतीय समाज में मान्यता मिलनी चाहिए या पब संस्कृति भारतीय सभ्यता के लिए हानिकारक है? मेरी ब्याक्तिगत राय में पब संस्कृति न कभी भारतीय संस्कृति का अंग रही होगी और न कभी इसको भारतीय संस्कृति में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए. हमारी अपनी संस्कृति अपने आप में अदुतीय है. विश्व में यदि कोई संस्कारित और पर हितकारी संस्कृति है तो वो है "भारतीय संस्कृति ". क्यों हम लोग अपनी संस्कृति को बिगाड़ने का काम कर रहे है?, क्यों हम लोग पश्चिमी संस्कृति में मिश्रित होना चाहते है. आज जो लोग २१वी सदी की दुहाई देते हुए कहते है लोग चाँद पर पहुच गए है और हम आज भी वही ४०-५० पहले वाली सोच पाले हुए है, बुजुर्गों की सोच पाले हुए है. ये राग आलापते हुए कि आज दुनिया विकास कर रही है, हम लोग विकास कर रहे है तो हमको अपनी सोच भी बदलनी चाहिए, हमें भी विकास करना चाहिए. मैं भी इस बात से इतेफाक रखता हूँ कि जरूर हमें भी विकास करना चाहिए किस क्षेत्र में- आर्थिक क्षेत्र में, बोधिक क्षेत्र में, तकनीकी के क्षेत्र में, हमें भी इतना विकास करना चाहिए कि कोई भी भूख से न मरे, प्यास से न मरे, तन ढकने के लिए सबको कपड़ा मिले. हमें ऐसा विकास चाहिए.
आर्थिक विकास और तकनीकी विकास की तो हम हमेशा बात करते रहते है लेकिन क्या कभी हमने सामाजिक विकास की बात की.क्या हमने कभी सोचा कि हमारा सामाजिक विकास किस प्रकार होना चाहिए. क्या आर्थिक दृष्टि से मजबूत होना ही विकास को परिभाषित करता है? क्या सामजिक मूल्यों का विकास में कोई योगदान नही है? जो लोग पब संस्कृति की बात कर रहे है मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि किसी भी पब में जाकर नृत्य करना, दारु नशा और विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करके उसमे झूमना, ये किस विकास की बात हो रही है और ये कोंसी सभ्यता है?
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