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Thursday, January 20, 2011
Thursday, December 30, 2010
नैतिक शिक्षा को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम
भटकाव और अपाधापी के दौर में तनावग्रस्त वर्त्तमान समाज में नैतिक शिक्षा के साथ
जैनत्व का परिज्ञान कराने में जैन संस्थाएँ सक्रिय भूमिका का निर्वहन कर रही है ।
इन संस्थाओं में “दिगंबर जैन नैतिक शिक्षा समिति” “अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन
परिषद” और जैन मिलन समिति का अहम योगदान है । केन्द्र सरकार ने तो नहीं बल्कि कुछ
राज्य सरकारों ने जैन समाज को अल्पसंख्यक श्रेणी में डाल दिया है । इस श्रेणी में
आने के कारण जैन समाज के बच्चों को पुस्तकें एवं स्टेशनरी के मद में नकद भुगतान की
व्यवस्था है । परन्तु संस्थाओं के अनुसार जितना रकम सरकार जैन समाज के बच्चों को
छात्रवृत्ति मद में देती है उसका दस गुना रकम तो हमलोग दान दे देते है, अर्थात
उन्हें इसका कोई फायदा नहीं दिखता । वे तो केवल ये चाहते हैं कि सरकार जैन समाज
द्वारा संचालित विद्यालयों/महाविद्यालयों पर अंकुश ना लगाए । जैन समाज के बच्चे
अपने विद्यालयों में पढ़कर अपनी प्रतिभा को निखार सके ।
नैतिक शिक्षा के प्रति
उदासीन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल एक देश एक शैक्षिक बोर्ड की वकालत
कर रहे हैं और मार्किंग की जगह ग्रेड सिस्टम लागू करने जा रहे हैं, वहीं जैन समाज
के बुद्धिजीवियोँ का कहना है कि इससे शैक्षिक विकृति ही बढेगी । विद्यार्थियों में
पढ़ाई के प्रति चिंता कम हो जाएगी । उन्हें फेल होने का डर ही नहीं होगा । कुछ ऐसे
ही विचार व्यक्त करती हैं- शकरपुर, दिल्ली की कुसुमलता जैन जो “दिगंबर जैन नैतिक
शिक्षा समिति द्वारा आयोजित नैतिक शिक्षा शिविर की सह संयोजिका भी हैं । श्रीमती
जैन उ० प्र० के बागवत जिले की पूर्व भाजपा पार्षद एवं प्रधानाध्यापिका रह चुकी है ।
नैतिक शिक्षा, संस्कार और पर्यावरण आदि उनके प्रिय विषय होने के कारण वे बच्चों में
इस गुण को काफी लगन से समाहित करने के अभियान में जुटी हैं । वे मानती हैं कि नैतिक
शिक्षा को सरकारी पाठ्यक्रम में प्रमुख स्थान मिले एवं शिक्षकगण इस विषय को केवल
टाइमपास नहीं बल्कि प्रमुख उत्तरदायित्व के रूप में लें क्योंकि नैतिक शिक्षा ही तो
जीवन की प्रमुख आधारशिला है । अपने अनुभव पर प्रकाश डालते हुए वे कहती हैं कि आज
बच्चों में अभिभावक एवं शिक्षकों की मानसिकता के अलग होने के कारण द्वन्द चल रहा है
। बच्चा यह नहीं समझ पा रहा है कि वह शिक्षक का आदेश माने या आभिभावक का । शिक्षक
नैतिक शिक्षा के विषय को पढाने के बजाय मार्कशीट में ग्रेड प्रणाली को अपनाकर अपने
कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं वहीं कुछ अभिभावक खुद तो टीवी देखते हैं और
बच्चों को टीवी से दूर रहने की सलाह देते है । कुछ अभिभावक गण खुद असत्य बोलते है
और बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वे सत्य का आचरण अपनाएँ । यह कैसे संभव होगा?
नैतिक शिक्षा को आत्मसात् करने एवं संपूर्ण समाज में प्रवाहित करने की जिम्मेदारी
सबों की है ।
हम बदलेंगे तभी तो, युग बदलेगा । जिस प्रकार किसान बीच को जमीन के
अंदर बोकर सिंचाई करने के साथ-साथ समय की प्रतीक्षा करता है । आज आवश्यकता है कि
बच्चों के कोमल मन को कोई नीचे से भी चोट करे और उपर से भी तथा बीच में उसे आकार
देने का कार्य किया जाय बच्चों में मन में राष्ट्रीयता और स्वाभिमान का बीज बोकर हम
सब संस्कारित करने का पुण्य कार्य कर सकते हैं । आज ग्लोबल वार्मिंग के असर से
दुनियाँ कराह रही है । बच्चों को इस संबंध में ज्ञान चक्षु खोलने की आवश्यकता है
क्योंकि बच्चे और युवा वर्ग ग्लोबल वार्मिग कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका
का निर्वहन कर सकते हैं । पाश्चात्य देश की सभ्यता और टीवी संस्कृति पर सेंसरशिप
बच्चों के साथ-साथ राष्ट्रहित में भी होगा वर्त्तमान में जो स्वतंत्रता सेनानी बचे
हैं उनमे जिनका निधन होता है उनसे संबंधित कार्यक्रम नहीं होता । आज उनसे संबंधित
कार्यक्रम का आयोजन कर बच्चों को स्वतंत्रता के प्रति योगदान विषय की जानकारी दी
जानी चाहिए जिससे उनका देशप्रेम बढेगा । अंधविश्वास एवं वृद्धाश्रम में बच्चों के
हाथ से उपहार बँटवाए जाँय जिससे ममता और प्यार के साथ-साथ सेवाभाव बढे़गा । हमें
स्वयं भी समझना पड़ेगा कि हमारे जीवन का मूल आधार तो नैतिकता ही है, संस्कार तो उसकी
शाखा है । आज संस्थाओं में भी ज्यादातर के उदेश्य अच्छे हैं पर कभी-कभी उनके कार्य
उद्देश्य से हट जाते हैं ।
हमें इस पर पूरा ध्या रखना पड़ेगा । विज्ञान ने विकास
किया जो सीमित दायरे में लाभकारी है परंतु जब यह जन-जन के लिए सुलभ होगा तो परेशानी
बढेगी । इन्हीं कारणों से देशों में आत्मरक्षा एवं प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ गई है
। देश को आजादी दिलाने एवं सत्य अहिंसा का संदेश देनेवाले गांधी आज अप्रासंगिक हो
गए हैं । गाँधी संग्रहालय में भीड़ नहीं है परन्तु मॉल भरा हुआ । हमें बच्चों को
अपने गुरूओं, धरोहरों, संपदाओं से परिचित कराना चाहिए । पहले यूपी में उ०प्र० में
नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम में थी आज की स्थिति स्पष्ट नही, परन्तु मेरा मत है कि
नैतिक शिक्षा को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय बनाया जाय ।
जैनत्व का परिज्ञान कराने में जैन संस्थाएँ सक्रिय भूमिका का निर्वहन कर रही है ।
इन संस्थाओं में “दिगंबर जैन नैतिक शिक्षा समिति” “अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन
परिषद” और जैन मिलन समिति का अहम योगदान है । केन्द्र सरकार ने तो नहीं बल्कि कुछ
राज्य सरकारों ने जैन समाज को अल्पसंख्यक श्रेणी में डाल दिया है । इस श्रेणी में
आने के कारण जैन समाज के बच्चों को पुस्तकें एवं स्टेशनरी के मद में नकद भुगतान की
व्यवस्था है । परन्तु संस्थाओं के अनुसार जितना रकम सरकार जैन समाज के बच्चों को
छात्रवृत्ति मद में देती है उसका दस गुना रकम तो हमलोग दान दे देते है, अर्थात
उन्हें इसका कोई फायदा नहीं दिखता । वे तो केवल ये चाहते हैं कि सरकार जैन समाज
द्वारा संचालित विद्यालयों/महाविद्यालयों पर अंकुश ना लगाए । जैन समाज के बच्चे
अपने विद्यालयों में पढ़कर अपनी प्रतिभा को निखार सके ।
नैतिक शिक्षा के प्रति
उदासीन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल एक देश एक शैक्षिक बोर्ड की वकालत
कर रहे हैं और मार्किंग की जगह ग्रेड सिस्टम लागू करने जा रहे हैं, वहीं जैन समाज
के बुद्धिजीवियोँ का कहना है कि इससे शैक्षिक विकृति ही बढेगी । विद्यार्थियों में
पढ़ाई के प्रति चिंता कम हो जाएगी । उन्हें फेल होने का डर ही नहीं होगा । कुछ ऐसे
ही विचार व्यक्त करती हैं- शकरपुर, दिल्ली की कुसुमलता जैन जो “दिगंबर जैन नैतिक
शिक्षा समिति द्वारा आयोजित नैतिक शिक्षा शिविर की सह संयोजिका भी हैं । श्रीमती
जैन उ० प्र० के बागवत जिले की पूर्व भाजपा पार्षद एवं प्रधानाध्यापिका रह चुकी है ।
नैतिक शिक्षा, संस्कार और पर्यावरण आदि उनके प्रिय विषय होने के कारण वे बच्चों में
इस गुण को काफी लगन से समाहित करने के अभियान में जुटी हैं । वे मानती हैं कि नैतिक
शिक्षा को सरकारी पाठ्यक्रम में प्रमुख स्थान मिले एवं शिक्षकगण इस विषय को केवल
टाइमपास नहीं बल्कि प्रमुख उत्तरदायित्व के रूप में लें क्योंकि नैतिक शिक्षा ही तो
जीवन की प्रमुख आधारशिला है । अपने अनुभव पर प्रकाश डालते हुए वे कहती हैं कि आज
बच्चों में अभिभावक एवं शिक्षकों की मानसिकता के अलग होने के कारण द्वन्द चल रहा है
। बच्चा यह नहीं समझ पा रहा है कि वह शिक्षक का आदेश माने या आभिभावक का । शिक्षक
नैतिक शिक्षा के विषय को पढाने के बजाय मार्कशीट में ग्रेड प्रणाली को अपनाकर अपने
कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं वहीं कुछ अभिभावक खुद तो टीवी देखते हैं और
बच्चों को टीवी से दूर रहने की सलाह देते है । कुछ अभिभावक गण खुद असत्य बोलते है
और बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वे सत्य का आचरण अपनाएँ । यह कैसे संभव होगा?
नैतिक शिक्षा को आत्मसात् करने एवं संपूर्ण समाज में प्रवाहित करने की जिम्मेदारी
सबों की है ।
हम बदलेंगे तभी तो, युग बदलेगा । जिस प्रकार किसान बीच को जमीन के
अंदर बोकर सिंचाई करने के साथ-साथ समय की प्रतीक्षा करता है । आज आवश्यकता है कि
बच्चों के कोमल मन को कोई नीचे से भी चोट करे और उपर से भी तथा बीच में उसे आकार
देने का कार्य किया जाय बच्चों में मन में राष्ट्रीयता और स्वाभिमान का बीज बोकर हम
सब संस्कारित करने का पुण्य कार्य कर सकते हैं । आज ग्लोबल वार्मिंग के असर से
दुनियाँ कराह रही है । बच्चों को इस संबंध में ज्ञान चक्षु खोलने की आवश्यकता है
क्योंकि बच्चे और युवा वर्ग ग्लोबल वार्मिग कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका
का निर्वहन कर सकते हैं । पाश्चात्य देश की सभ्यता और टीवी संस्कृति पर सेंसरशिप
बच्चों के साथ-साथ राष्ट्रहित में भी होगा वर्त्तमान में जो स्वतंत्रता सेनानी बचे
हैं उनमे जिनका निधन होता है उनसे संबंधित कार्यक्रम नहीं होता । आज उनसे संबंधित
कार्यक्रम का आयोजन कर बच्चों को स्वतंत्रता के प्रति योगदान विषय की जानकारी दी
जानी चाहिए जिससे उनका देशप्रेम बढेगा । अंधविश्वास एवं वृद्धाश्रम में बच्चों के
हाथ से उपहार बँटवाए जाँय जिससे ममता और प्यार के साथ-साथ सेवाभाव बढे़गा । हमें
स्वयं भी समझना पड़ेगा कि हमारे जीवन का मूल आधार तो नैतिकता ही है, संस्कार तो उसकी
शाखा है । आज संस्थाओं में भी ज्यादातर के उदेश्य अच्छे हैं पर कभी-कभी उनके कार्य
उद्देश्य से हट जाते हैं ।
हमें इस पर पूरा ध्या रखना पड़ेगा । विज्ञान ने विकास
किया जो सीमित दायरे में लाभकारी है परंतु जब यह जन-जन के लिए सुलभ होगा तो परेशानी
बढेगी । इन्हीं कारणों से देशों में आत्मरक्षा एवं प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ गई है
। देश को आजादी दिलाने एवं सत्य अहिंसा का संदेश देनेवाले गांधी आज अप्रासंगिक हो
गए हैं । गाँधी संग्रहालय में भीड़ नहीं है परन्तु मॉल भरा हुआ । हमें बच्चों को
अपने गुरूओं, धरोहरों, संपदाओं से परिचित कराना चाहिए । पहले यूपी में उ०प्र० में
नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम में थी आज की स्थिति स्पष्ट नही, परन्तु मेरा मत है कि
नैतिक शिक्षा को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय बनाया जाय ।
Tuesday, December 28, 2010
ष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य न्यायमूर्ति
ष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य न्यायमूर्ति श्री वाई. भास्कर राव ने कहा है कि
सशक्त व सुदृढ भारत के निर्माण के लिए आम आदमी को शिक्षित तथा मानवाधिकारों के बारे
में जागरूक बनाना होगा।
श्री राव आज यहां शासन सचिवालय के एस.एस.ओ. भवन में
‘‘मानवाधिकार शिक्षा’’ विषय पर आयोजित बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे।
बैठक में
राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्य न्यायमूर्ति श्री जगतसिंह, श्री धर्मसिंह मीणा,
श्री पुखराज सिरवी एवं महानिरीक्षक पुलिस, मानवाधिकार श्री एन.मोरिस बाबू सहित
विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि, चिकित्सक, वकील, शिक्षाविद् एवं शिक्षा
विभाग के अलावा विभिन्न विभागों के उच्चाधिकारी उपस्थित थे।
श्री भास्कर राव ने
अपने उद्बोधन में कहा कि विश्व के अनेक देशों की बजाय भारत की मानवाधिकारों की
रक्षा की दृष्टि से अच्छी स्थिति है फिर भी आज के बढते वैश्वीकरण के दौर में
मानवाधिकारों के प्रति प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक करने के साथ शिक्षित करना बहुत
जरूरी है। उन्होंने माना कि आज के दौर में हर जगह मानवाधिकारों का हनन हो रहा है
इसका मुख्य कारण किसी भी व्यक्ति का मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति जागरूक व गंभीर
नहीं होना है।
उन्होंने कहा कि समाज का बुद्धिजीवी वर्ग, वकील, उच्चाधिकारी एवं
शिक्षाविद् भी मानवाधिकारों के प्रति अपने दायित्वों को भलीभांति समझें। उन्होंने
कहा कि भारतीय सेना व राज्यों की पुलिस को भी मानवाधिकार की रक्षा में अपनी समर्पित
व सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। उन्होंने कहा कि आज के दौर में मानवाधिकारों की
रक्षा करना जरूरी हो गया है, इसमें व्यापक जनहित निहित है। उन्होंने विद्या का
महत्व बताते हुए कहा कि विद्या मानव का हर जगह सहयोग करती है। साथ ही विद्या का
ज्ञान दूसरों को देने से इसमें बढोतरी होती है। उन्होंने कहा कि विद्या कभी घटती
नहीं और न ही इसको कोई छीन सकता है।
न्यायमूर्ति श्री राव ने कहा कि आज विश्व के
सामने सबसे बडी समस्या आतंकवाद की है और इस पर नियंत्रण करने के लिये पूरे विश्व
में आज गांधीजी के विचारों और आदर्शों को प्रमुख हथियार माना जा रहा है। उन्होंने
कहा कि सभी शिक्षण संस्थानों के साथ स्वयंसेवी संस्थाओं व अन्य जनकल्याणकारी
संस्थाओं में मानवाधिकार शिक्षा को साथ में चलाना होगा। उन्होंने सभी शिक्षण
संस्थाओं में नैतिक शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने की आवश्यकता जताई।
उन्होंने सभी विद्यालयों म शिक्षकों को मानवाधिकार शिक्षा के बारे में प्रशिक्षित
करने पर भी जोर दिया।
इससे पहले राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति
श्री एस.के. जैन ने कहा कि राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के पिछले दो वर्ष के
कार्यकाल में मानवाधिकार के प्रति साक्षरता, प्रचार-प्रसार, जागरूकता एवं अधिकारों
के संरक्षण के लिए लोक सेवकों एवं जनसाधारण में संवेदनशीलता से काम करने को बढावा
मिला है।
उन्होंने यह भी बताया कि मानवाधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिये इस
आयोग एवं राष्ट्रीय आयोग की पहल पर विश्वविद्यालयों में मानवाधिकारों के पाठ्यक्रम
शुरु करने के साथ-साथ शिक्षाविदों के लिये भी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आरंभ किये हैं।
श्री जैन ने कहा कि प्रभावी मानवाधिकार शिक्षा नैतिक गुणों, दृष्टिकोण और व्यवहार
के अलावा मातृत्व भावना के साथ ज्ञान और तार्किक क्षमता भी विकसित करती है। हमारे
रोजमर्रा के जीवन में मानवाधिकारों की संवेदनशीलता हमें उसी प्रकार का व्यवहार करने
के लिए प्रेरित करती है जैसा हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं।
बैठक में विभिन्न
स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों, वकीलों एवं शिक्षाविदों ने राज्य में अवैध
परिवहन के साधनों से हो रही दुर्घटनाओं, राजकीय शिक्षण संस्थाओं के साथ अन्य निजी
शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा लागू करने, शिक्षा कार्यक्रम में मानवाधिकार को
डालना, मानवाधिकारों के मतलब के बारे में सबको बताना एवं मानवाधिकार के हनन के
मामले में विभिन्न न्यायालयों द्वारा दिये गये फैसलों को अमल में लाने की आवश्यकता
प्रतिपादित करने के साथ अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये।
अन्त में आयोग के सदस्य
न्यायमूर्ति श्री जगतसिंह ने धन्यवाद देते हुए मानवाधिकारों के सम्बन्ध में बताया
कि बच्चे के गर्भ में जाने से ही मानवाधिकार शुरु हो जाता है। उन्होंने माना कि आज
हर क्षेत्र में बडा आदमी अधीनस्थ का शोषण करता है और यह भी मानवाधिकार हनन का मामला
है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक आदमी को अपनी सोच को बदलते हुए दूसरे के काम को पूरा
करने में सहयोग करने की सोच विकसित करनी होगी। प्रारंभ में श्री भास्कर राव ने सभी
का परिचय किया।
सशक्त व सुदृढ भारत के निर्माण के लिए आम आदमी को शिक्षित तथा मानवाधिकारों के बारे
में जागरूक बनाना होगा।
श्री राव आज यहां शासन सचिवालय के एस.एस.ओ. भवन में
‘‘मानवाधिकार शिक्षा’’ विषय पर आयोजित बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे।
बैठक में
राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्य न्यायमूर्ति श्री जगतसिंह, श्री धर्मसिंह मीणा,
श्री पुखराज सिरवी एवं महानिरीक्षक पुलिस, मानवाधिकार श्री एन.मोरिस बाबू सहित
विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि, चिकित्सक, वकील, शिक्षाविद् एवं शिक्षा
विभाग के अलावा विभिन्न विभागों के उच्चाधिकारी उपस्थित थे।
श्री भास्कर राव ने
अपने उद्बोधन में कहा कि विश्व के अनेक देशों की बजाय भारत की मानवाधिकारों की
रक्षा की दृष्टि से अच्छी स्थिति है फिर भी आज के बढते वैश्वीकरण के दौर में
मानवाधिकारों के प्रति प्रत्येक व्यक्ति को जागरूक करने के साथ शिक्षित करना बहुत
जरूरी है। उन्होंने माना कि आज के दौर में हर जगह मानवाधिकारों का हनन हो रहा है
इसका मुख्य कारण किसी भी व्यक्ति का मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति जागरूक व गंभीर
नहीं होना है।
उन्होंने कहा कि समाज का बुद्धिजीवी वर्ग, वकील, उच्चाधिकारी एवं
शिक्षाविद् भी मानवाधिकारों के प्रति अपने दायित्वों को भलीभांति समझें। उन्होंने
कहा कि भारतीय सेना व राज्यों की पुलिस को भी मानवाधिकार की रक्षा में अपनी समर्पित
व सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिये। उन्होंने कहा कि आज के दौर में मानवाधिकारों की
रक्षा करना जरूरी हो गया है, इसमें व्यापक जनहित निहित है। उन्होंने विद्या का
महत्व बताते हुए कहा कि विद्या मानव का हर जगह सहयोग करती है। साथ ही विद्या का
ज्ञान दूसरों को देने से इसमें बढोतरी होती है। उन्होंने कहा कि विद्या कभी घटती
नहीं और न ही इसको कोई छीन सकता है।
न्यायमूर्ति श्री राव ने कहा कि आज विश्व के
सामने सबसे बडी समस्या आतंकवाद की है और इस पर नियंत्रण करने के लिये पूरे विश्व
में आज गांधीजी के विचारों और आदर्शों को प्रमुख हथियार माना जा रहा है। उन्होंने
कहा कि सभी शिक्षण संस्थानों के साथ स्वयंसेवी संस्थाओं व अन्य जनकल्याणकारी
संस्थाओं में मानवाधिकार शिक्षा को साथ में चलाना होगा। उन्होंने सभी शिक्षण
संस्थाओं में नैतिक शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने की आवश्यकता जताई।
उन्होंने सभी विद्यालयों म शिक्षकों को मानवाधिकार शिक्षा के बारे में प्रशिक्षित
करने पर भी जोर दिया।
इससे पहले राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति
श्री एस.के. जैन ने कहा कि राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के पिछले दो वर्ष के
कार्यकाल में मानवाधिकार के प्रति साक्षरता, प्रचार-प्रसार, जागरूकता एवं अधिकारों
के संरक्षण के लिए लोक सेवकों एवं जनसाधारण में संवेदनशीलता से काम करने को बढावा
मिला है।
उन्होंने यह भी बताया कि मानवाधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिये इस
आयोग एवं राष्ट्रीय आयोग की पहल पर विश्वविद्यालयों में मानवाधिकारों के पाठ्यक्रम
शुरु करने के साथ-साथ शिक्षाविदों के लिये भी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आरंभ किये हैं।
श्री जैन ने कहा कि प्रभावी मानवाधिकार शिक्षा नैतिक गुणों, दृष्टिकोण और व्यवहार
के अलावा मातृत्व भावना के साथ ज्ञान और तार्किक क्षमता भी विकसित करती है। हमारे
रोजमर्रा के जीवन में मानवाधिकारों की संवेदनशीलता हमें उसी प्रकार का व्यवहार करने
के लिए प्रेरित करती है जैसा हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं।
बैठक में विभिन्न
स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों, वकीलों एवं शिक्षाविदों ने राज्य में अवैध
परिवहन के साधनों से हो रही दुर्घटनाओं, राजकीय शिक्षण संस्थाओं के साथ अन्य निजी
शिक्षण संस्थाओं में नैतिक शिक्षा लागू करने, शिक्षा कार्यक्रम में मानवाधिकार को
डालना, मानवाधिकारों के मतलब के बारे में सबको बताना एवं मानवाधिकार के हनन के
मामले में विभिन्न न्यायालयों द्वारा दिये गये फैसलों को अमल में लाने की आवश्यकता
प्रतिपादित करने के साथ अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये।
अन्त में आयोग के सदस्य
न्यायमूर्ति श्री जगतसिंह ने धन्यवाद देते हुए मानवाधिकारों के सम्बन्ध में बताया
कि बच्चे के गर्भ में जाने से ही मानवाधिकार शुरु हो जाता है। उन्होंने माना कि आज
हर क्षेत्र में बडा आदमी अधीनस्थ का शोषण करता है और यह भी मानवाधिकार हनन का मामला
है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक आदमी को अपनी सोच को बदलते हुए दूसरे के काम को पूरा
करने में सहयोग करने की सोच विकसित करनी होगी। प्रारंभ में श्री भास्कर राव ने सभी
का परिचय किया।
Sunday, December 26, 2010
सैकडों सालों की गुलामी
सैकडों सालों की गुलामी का हम लोगों पर इतना गहरा असर हो गया है कि हिन्दुस्तान जो
किसी जमाने में सारी दुनियां को रास्ता दिखाता था, आज उसी देश की बहुसंख्यक जनता हर
तरह की भ्रष्ट विदेशी आयात के पीछे लार टपकाती भागती है.
इतिहास में यौन
शिक्षा की मुख्यतया दो अवधारणायें रही है: पश्चिमी एवं पूर्वी. पश्चिमी अवधारणा में
मनुष्य को सिर्फ एक उन्नत किस्म के जानवर के समान देखा जाता है, एवं पश्चिम की यौन
शिक्षा सिर्फ एक उन्नत किस्म के जानवरों के मैथुन (कंडोम आदि पहन कर) की ट्रेनिंग
है. पूर्वी अवधारणा मनुष्य को आत्मिक एवं शारीरिक तल पर देखता है अत: पूर्व में यौन
शिक्षा एक आत्मिक-नैतिक शिक्षा है. लेकिन आज हिन्दुस्तान में शिक्षाविद लोग जिस यौन
शिक्षा की बात करते हैं वह पश्चिमी अवधारणा पर आधारित है. उसका पाठ्यक्रम अमरीका
एवं यूरोप से वैसा का वैसा उठा कर हिन्दुस्तान लाया गया है. शिक्षा की पश्चिमी
अवधारणा अपने आप में इतनी सीमित एवं यांत्रिक है कि वह यौन संबंध एवं रेलगाडी के
डिब्बों की शंटिग में कोई फरक नहीं करती. वे बच्चों को सिखाते हैं कि कोई भी डब्बा
जरूरत पडने पर अपने समान (समलैंगिक) या अपने विपरीत किसी भी डब्बे के साथ जुड सकता
है. न धर्म आडे आता है, न नैतिकता या समाज. न ही कभी यह पूछा जाता है कि जीवन में
कितने डिब्बों से जुडे. उन के अनुसार सिर्फ एक बात का ख्याल रखना है: “सबकुछ बिना
गडबड के, बिना गर्भधान के, बिना एड्स पाये, बिना मां बाप की जानकारी के,
करो”.
आरंभ के लगभग 25 साल की यौन शिक्षा ने अमरीकी युवा पीढी को इस तरह
व्यभिचारी, सम लैंगिक, गुदा मैथुन प्रिय, मुख मैथुन प्रिय, यौन मामलों में हिंसक
एवं बहु पुरुष, बहु स्त्री, एवं बहु विवाह कामी, बना दिया था कि 1970 के अंत तक
अमरीका में इसका कडा विरोध शुरू हो गया. यहां तक कि यौन शिक्षा का विरोध करने वाले
हजारों परिवारों को 1980 के द्शक में जेल भेजा गया. लेकिन वे न हारे. अंत मे हारी
अमरीका की सरकार. आज अमरीका में कम से कम तीस से पचास लाख ऐसे परिवार हैं जो इन
बातों के विरोध के कारण मुक्त विद्यालयों की मदद से अपने बच्चों को घर बैठ कर पढाते
है. लगभग 25 साल से यह चल रहा है. इसका परिणाम इतना चौंका देने वाला है कि
पाश्चात्य यौन शिक्षा को हिन्दुस्तान में आयात करने के लिये जो लोग बेताब हैं उनको
इन पचास सालों के अमरीकी प्रयोगों का परिणाम डंडे मार मार कर सिखाया जाना चाहिये.
कहीं ऐसा न हो कि अमरीका का अंधानुकरण हमारी युवा पीढी को व्यभिचारियों एवं
वेश्याओं का एक समूह बना दे. वहां यह हो रहा है, लेकिन यहां उसकी क्या जरूरत है?
किसी जमाने में सारी दुनियां को रास्ता दिखाता था, आज उसी देश की बहुसंख्यक जनता हर
तरह की भ्रष्ट विदेशी आयात के पीछे लार टपकाती भागती है.
इतिहास में यौन
शिक्षा की मुख्यतया दो अवधारणायें रही है: पश्चिमी एवं पूर्वी. पश्चिमी अवधारणा में
मनुष्य को सिर्फ एक उन्नत किस्म के जानवर के समान देखा जाता है, एवं पश्चिम की यौन
शिक्षा सिर्फ एक उन्नत किस्म के जानवरों के मैथुन (कंडोम आदि पहन कर) की ट्रेनिंग
है. पूर्वी अवधारणा मनुष्य को आत्मिक एवं शारीरिक तल पर देखता है अत: पूर्व में यौन
शिक्षा एक आत्मिक-नैतिक शिक्षा है. लेकिन आज हिन्दुस्तान में शिक्षाविद लोग जिस यौन
शिक्षा की बात करते हैं वह पश्चिमी अवधारणा पर आधारित है. उसका पाठ्यक्रम अमरीका
एवं यूरोप से वैसा का वैसा उठा कर हिन्दुस्तान लाया गया है. शिक्षा की पश्चिमी
अवधारणा अपने आप में इतनी सीमित एवं यांत्रिक है कि वह यौन संबंध एवं रेलगाडी के
डिब्बों की शंटिग में कोई फरक नहीं करती. वे बच्चों को सिखाते हैं कि कोई भी डब्बा
जरूरत पडने पर अपने समान (समलैंगिक) या अपने विपरीत किसी भी डब्बे के साथ जुड सकता
है. न धर्म आडे आता है, न नैतिकता या समाज. न ही कभी यह पूछा जाता है कि जीवन में
कितने डिब्बों से जुडे. उन के अनुसार सिर्फ एक बात का ख्याल रखना है: “सबकुछ बिना
गडबड के, बिना गर्भधान के, बिना एड्स पाये, बिना मां बाप की जानकारी के,
करो”.
आरंभ के लगभग 25 साल की यौन शिक्षा ने अमरीकी युवा पीढी को इस तरह
व्यभिचारी, सम लैंगिक, गुदा मैथुन प्रिय, मुख मैथुन प्रिय, यौन मामलों में हिंसक
एवं बहु पुरुष, बहु स्त्री, एवं बहु विवाह कामी, बना दिया था कि 1970 के अंत तक
अमरीका में इसका कडा विरोध शुरू हो गया. यहां तक कि यौन शिक्षा का विरोध करने वाले
हजारों परिवारों को 1980 के द्शक में जेल भेजा गया. लेकिन वे न हारे. अंत मे हारी
अमरीका की सरकार. आज अमरीका में कम से कम तीस से पचास लाख ऐसे परिवार हैं जो इन
बातों के विरोध के कारण मुक्त विद्यालयों की मदद से अपने बच्चों को घर बैठ कर पढाते
है. लगभग 25 साल से यह चल रहा है. इसका परिणाम इतना चौंका देने वाला है कि
पाश्चात्य यौन शिक्षा को हिन्दुस्तान में आयात करने के लिये जो लोग बेताब हैं उनको
इन पचास सालों के अमरीकी प्रयोगों का परिणाम डंडे मार मार कर सिखाया जाना चाहिये.
कहीं ऐसा न हो कि अमरीका का अंधानुकरण हमारी युवा पीढी को व्यभिचारियों एवं
वेश्याओं का एक समूह बना दे. वहां यह हो रहा है, लेकिन यहां उसकी क्या जरूरत है?
Friday, December 24, 2010
जीवन-मूल्य या मानव मूल्य
इस पर देश के विद्वानों में मतभिन्नता चर्चा है वस्तुत: दोनों में बहुत अंतर नहीं
है। दोनों को मिलाकर मूल्य आधारित शिक्षा कहना अधिक उपयोगी होगा। धार्मिक,
आध्यात्मिक एवं नैतिक शिक्षा भी इसी में सम्मिलत है।
मूल्य का अर्थ -
o एक
अर्र्थ में मूल्य शब्द का अर्थ कीमत, क्रय-विक्रय के अर्थ में उपयोग होता है
o
जिसमें आदर्श और पुरूषार्थ है, जिसमे मानव जीवन का सम्पूर्ण विकास हो सके।
o
मूल्य के अर्न्तगत सभी गुण समाविष्ट होने चाहिए जिनका सम्बन्ध अभ्यन्तर(आत्मनेपद)
बाह्य(परस्मैपद) और एक साथ दोनों (अभयपद)
भारतीय जीवनमूल्यों को समझने की
मुख्यत: तीन दृष्टियाँ हो सकती हैं।
1 दार्शनिक आधार
2 सामाजिक चेतना
3
वैयक्तिक चरित्र = आचरण
शिक्षा का अर्थ है :- विद्या ज्ञान का अर्जन और
हस्तांरण, प्रशिक्षण।
o वेद के छ: अंगों मे से शिक्षा का प्रथम स्थान है
(शिक्षा, कल्प, निरूक्त, व्याकरण, छन्दस् और ज्योतिष)
o एतरेय उपनिषद के
मंगलाचरण मंत्र में शिक्षा का अर्थ :-
o वाड् में मनसि प्रतिष्ठिता। मनो मेवाचि
प्रतिष्ठितम् । आविराविर्म एधि।श्रुतं मे मा प्रहासी:। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्
सन्दधामिं। ऋतंवदिष्यामि। सत्यंवदिष्यामी। तन्मामवतु। तद्धत्कारमवतु अवतु माम।
अवतुवत्कारम। अवतुवक्तारम्। ; शान्ति: शान्ति: शान्ति:।
भावार्थ :- मेरी वाणी
मेरे मन में प्रतिष्ठित हो। मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो। आप परमेश्वर जो
सर्वत्र प्रकट है, यहाँ-शिक्षा-स्थल पर-साक्षात् प्रकट हों। मैं जो शिक्षा प्राप्त
करूँ, वह नष्ट व्यर्थ न होने पाए। इस अध्ययन के द्वारा मैं अपने दिन-रात का पोषण
करता हूँ। मैं अपनी वाणी से धर्मानुकूल न्यायोचित वचन कहुँगा। मैं सत्य वचन बोलूगा।
वह धर्म वह सत्य मेरी रक्षा करे। वक्त की रक्षा करे। मेरी-श्रोता (शिष्य) की तथा
वक्ता- शिक्षक की रक्षा करे।(और हम दोनों के बीच होनेवाला शिक्षा का विनिमय), हे
ओंकार स्वरूप परमात्मन्। तीनों लोको- पृथ्वी, आकाश, पाताल में शान्ति प्रसार करने
वाला हो।
o शिक्षा के अन्य अर्थ है : विनम्रता और विनयशीलता, श्रुति
मधुरता-(विद्या ददाति विनमय)
शिक्षा से अभिप्रेत
ऐसी शिक्षा जिससे व्यक्तित्व
के संसारिक एवं पारमार्थिक विकास को उपलब्ध किया जा सके।
- जो गुरू-शिष्य,
अपने-पराये तथा विश्वभर के लिए शान्ति के सन्देश वाहिका हो।
- जिसमे वाणी और मन
की अक्षतता (Intigrity of thought and Speech) विद्यमान हो।
- जो धर्मानुकूल,
न्यायसम्मत तथा सत्ययुक्त जीवन व्यतीत करने की प्ररेणा देती हो।
- जिससे योग और
क्षेम की तथा अर्थ और परमार्थ की सिद्धि सम्मत हो।
- जो हमे विनित, विनम्र और
मृदुभाषी बना सके।
;गुरूवाणी में कहा गया है कि ”सच सबसे ऊपर है, यदि उससे ऊपर
कुछ है तो वह है
सच का आचरण।”
& दान, यज्ञ, तप, होम और वेद – इन सबका
आधार सत्य है।
शाश्वत, उपरिमेय सत्य की अनुभूति: जीवन का चरम मूल्य है।
हिन्दुधर्म मे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन के चार पुरूषार्थ माना गया है।
धर्मपूर्वक अर्थ, काम का सेवन करने हेतु मूल्यों की स्थापना की है।
मनुस्मृति
में धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह:, बुद्धि, विद्या, सत्य
और
अक्रोध-धर्म के दस लक्षण कहे गए है ^^xq:ukud**
- कीरत करो, नामजपो,
बंडछको अर्थात ‘ संगत, पंगत और लंगर’ के दर्शन का प्रतिपादन
करते हुए सामाजिक
समरसता का प्रचार किया।
उपनिषद के तीन द ‘द-द-द’ स्वर हमे दमन, दान, दया को
जीवन-मूल्यों के रूप में
अपनाने की शिक्षा देता है।
जैन दर्शन
& जैन
दर्शन में सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य मूल्यों पर बल दिया
है।
- जो अपना नही है उसे प्राप्त करने की इच्छा करना भी चोरी
है।
श्रीमद्भागवत् में तो कहा है- अपने जीवन-निर्वाह की आवश्यकता से अधिक जो
अपने पास
रखता है अर्थात दान नहीं करता वह – चोरी के धन का ही उपयोग करता
है।
स्वामी विवेकानंद
”पत्थर की मांशपेशियाँ और फौलाद के भुजदण्ड” मन से
छिछली भावुक्ता के प्रवाह को निरूद्ध करने में समर्थ और बुद्धि से विभिन्न प्रकार
की शिक्षा- कला तथा वैज्ञानिक विद्याओं को आत्मसात् करने को तत्पर-विद्यार्थी -जीवन
में इन गुणों के विकास के लिए ही ब्रह्मचर्य को जीवन- मूल्यों के रूप में अपनाने की
आवश्यकता को रेखांकित किया गया था।
श्री कृष्ण के शब्दो में
- ”धर्म
विरूद्धों भूतेषु कामोडस्मि भरतर्षम” -गीता
बौद्धधर्म के सुत्तनिपात, खुदुकपाठ
इत्यादि ग्रन्थों में भगवान बुद्ध की देशना के अर्न्तगत मैत्री, करूणा, उपकार,
जीवदया, आदि गुणों पर बार-बार बल दिया गया है।
श्रीमद्भागवत गीता (17-14-16)
में शारीरिक, वाचिक व मानसिक तीन प्रकार के तपो का
उल्लेख है:-
32।171 –
क़ायिक तप: ईश्वर, विद्वान महापुरूषों तथा गुरूजनों का पूजन, ब्रह्मचर्य,
अहिंसा।
32।17।2 – वाचिक तप: प्रीतिकर, सत्य, प्रिय ओर हितकारी वाक्य, स्वाध्याय
का अभ्यास।
32।17।3 – मानसिक तप: प्रसन्न मन एकता, सौम्यत्व, मौन (मित भाषण)
आत्मसंयम, विचारो भावो की पवित्रता।
तैतरीय उपनिषद के प्रसिद्ध वचन है :
मातृदेवो भव:, पितृदेवोभव:, आचार्यदेवोभव:, अतिथिदेवोभव:।”स्वाध्यायन्मा
प्रमद:”
अहम् से वयम् की यात्रा मानव जीवन का लक्ष्य है और यही लक्ष्य शिक्षा
का है।
- मूल्य परक शिक्षा इस यात्रा में उसका पथ प्रदर्शन करती है।
- शरीर,
प्राण, मन, बुद्धि तथा आत्मा। पांच अंगों से पांच आधारभूत मूल्य नि:सृत होते
है-
सक्षमता, संतुलन, संयम, सत्यान्वेषण, (विवेक) तथा सेवा।
धृति, क्षमा,
दान, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य एवं आक्रोध इन दस गुणों का
मिलान यहुदियों, ईसाईयों के दस आदेशों से किया जा सकता है
सत्यं, शिवम्
सुन्दरम् ये तीनों गुण क्रम से ज्ञान इच्छा तथा क्रिया के प्रतीक है।
दैत्यराज
प्रहलाद ने प्राथमिकता के आधार पर शील, धर्म, सत्य, सदाचार, सबलता पांच गुण गिनाये
है।
पंतजलि ने अध्यात्मिक विकास के लिए अष्टांग मार्ग को प्रस्तुत किया है तथा
जीवनमूल्यों का वैयक्तिक तथा सामाजिक दो भागों में विभाजन किया है।
श्री
अरविन्द के अनुसार
-जबसे जीवन मूल्यों का शिक्षा से विछोह हो गया है तबसे
देशवासी ”धर्मभ्रष्ट तथा लक्ष्यभ्रष्ट” हो गये है।
विभिन्न आयोगों की
अनुशंसाएँ
- राधाकृष्ण आयोग के अनुसार धर्म के प्रति जो भारतीय दृष्टिकोण है
उसमें और धर्मनिरपेक्षता- (सर्वधर्म समभाव) में काई अन्तर नहीं है। भारत में धर्म
की शिक्षा का आधार आध्यात्मिकता है, बिना आध्यात्मिकता के नैतिक जीवन मूल्यों का
विकास सम्भव नहीं। धार्मिकता से अभिप्राय आध्यात्मिकता माना जाए, अत: धार्मिक
शिक्षा का अर्थ अध्यात्मिक शिक्षा होना चाहिए।
राधाकृष्ण आयोग ने धार्मिक,
नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए जो सुझाव दिये है वह इस प्रकार है:-
- सभी
शिक्षण संस्थाओं में कुछ मिनटों तक छात्र मौन रहकर ध्यान करें और फिर इसके बाद
शिक्षण कार्य प्रारम्भ हो। इसमें शिक्षक भी शामिल हो।
- विभिन्न धर्मो के
तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से उनसे सम्बन्धित ग्रन्थों (जैसे – गीता,
बाइबिल,
कुरान, गुरूग्रन्थ साहिब, धम्मपद आदि) के सारभूत अंश छात्रों को पढ़ाया जाए।
मृदलियार आयोग(52-53)- विद्यालयों में सामूहिक प्रार्थना और प्ररेक प्रसंगों को भी
महत्व दिया जाए। परिवार समाज और विद्यालय का परिवेश बालकों के नैतिक एवं चरित्र
विकास में सहायक हो।
- नैतिकता तथा आध्यात्मिकता का छात्रों के चरित्र निर्माण
में सहायक होना चाहिए।
कोठारी आयोग-(64-66) – के अनुसार नैतिक आध्यात्मिक
विकास के लिए सर्वधर्म समभाव की शिक्षा छात्रों को दी जाये, धार्मिक शिक्षा से
तात्पर्य नैतिक शिक्षा है। जिससे उनमें विभिन्न वर्गो की अच्छी बातों को ग्रहण करके
अपने चरित्र का निर्माण करे, देश के उत्थान में योगदान दें तथा मानव-कल्याण के लिए
अग्रसर हों।
है। दोनों को मिलाकर मूल्य आधारित शिक्षा कहना अधिक उपयोगी होगा। धार्मिक,
आध्यात्मिक एवं नैतिक शिक्षा भी इसी में सम्मिलत है।
मूल्य का अर्थ -
o एक
अर्र्थ में मूल्य शब्द का अर्थ कीमत, क्रय-विक्रय के अर्थ में उपयोग होता है
o
जिसमें आदर्श और पुरूषार्थ है, जिसमे मानव जीवन का सम्पूर्ण विकास हो सके।
o
मूल्य के अर्न्तगत सभी गुण समाविष्ट होने चाहिए जिनका सम्बन्ध अभ्यन्तर(आत्मनेपद)
बाह्य(परस्मैपद) और एक साथ दोनों (अभयपद)
भारतीय जीवनमूल्यों को समझने की
मुख्यत: तीन दृष्टियाँ हो सकती हैं।
1 दार्शनिक आधार
2 सामाजिक चेतना
3
वैयक्तिक चरित्र = आचरण
शिक्षा का अर्थ है :- विद्या ज्ञान का अर्जन और
हस्तांरण, प्रशिक्षण।
o वेद के छ: अंगों मे से शिक्षा का प्रथम स्थान है
(शिक्षा, कल्प, निरूक्त, व्याकरण, छन्दस् और ज्योतिष)
o एतरेय उपनिषद के
मंगलाचरण मंत्र में शिक्षा का अर्थ :-
o वाड् में मनसि प्रतिष्ठिता। मनो मेवाचि
प्रतिष्ठितम् । आविराविर्म एधि।श्रुतं मे मा प्रहासी:। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्
सन्दधामिं। ऋतंवदिष्यामि। सत्यंवदिष्यामी। तन्मामवतु। तद्धत्कारमवतु अवतु माम।
अवतुवत्कारम। अवतुवक्तारम्। ; शान्ति: शान्ति: शान्ति:।
भावार्थ :- मेरी वाणी
मेरे मन में प्रतिष्ठित हो। मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो। आप परमेश्वर जो
सर्वत्र प्रकट है, यहाँ-शिक्षा-स्थल पर-साक्षात् प्रकट हों। मैं जो शिक्षा प्राप्त
करूँ, वह नष्ट व्यर्थ न होने पाए। इस अध्ययन के द्वारा मैं अपने दिन-रात का पोषण
करता हूँ। मैं अपनी वाणी से धर्मानुकूल न्यायोचित वचन कहुँगा। मैं सत्य वचन बोलूगा।
वह धर्म वह सत्य मेरी रक्षा करे। वक्त की रक्षा करे। मेरी-श्रोता (शिष्य) की तथा
वक्ता- शिक्षक की रक्षा करे।(और हम दोनों के बीच होनेवाला शिक्षा का विनिमय), हे
ओंकार स्वरूप परमात्मन्। तीनों लोको- पृथ्वी, आकाश, पाताल में शान्ति प्रसार करने
वाला हो।
o शिक्षा के अन्य अर्थ है : विनम्रता और विनयशीलता, श्रुति
मधुरता-(विद्या ददाति विनमय)
शिक्षा से अभिप्रेत
ऐसी शिक्षा जिससे व्यक्तित्व
के संसारिक एवं पारमार्थिक विकास को उपलब्ध किया जा सके।
- जो गुरू-शिष्य,
अपने-पराये तथा विश्वभर के लिए शान्ति के सन्देश वाहिका हो।
- जिसमे वाणी और मन
की अक्षतता (Intigrity of thought and Speech) विद्यमान हो।
- जो धर्मानुकूल,
न्यायसम्मत तथा सत्ययुक्त जीवन व्यतीत करने की प्ररेणा देती हो।
- जिससे योग और
क्षेम की तथा अर्थ और परमार्थ की सिद्धि सम्मत हो।
- जो हमे विनित, विनम्र और
मृदुभाषी बना सके।
;गुरूवाणी में कहा गया है कि ”सच सबसे ऊपर है, यदि उससे ऊपर
कुछ है तो वह है
सच का आचरण।”
& दान, यज्ञ, तप, होम और वेद – इन सबका
आधार सत्य है।
शाश्वत, उपरिमेय सत्य की अनुभूति: जीवन का चरम मूल्य है।
हिन्दुधर्म मे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन के चार पुरूषार्थ माना गया है।
धर्मपूर्वक अर्थ, काम का सेवन करने हेतु मूल्यों की स्थापना की है।
मनुस्मृति
में धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह:, बुद्धि, विद्या, सत्य
और
अक्रोध-धर्म के दस लक्षण कहे गए है ^^xq:ukud**
- कीरत करो, नामजपो,
बंडछको अर्थात ‘ संगत, पंगत और लंगर’ के दर्शन का प्रतिपादन
करते हुए सामाजिक
समरसता का प्रचार किया।
उपनिषद के तीन द ‘द-द-द’ स्वर हमे दमन, दान, दया को
जीवन-मूल्यों के रूप में
अपनाने की शिक्षा देता है।
जैन दर्शन
& जैन
दर्शन में सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य मूल्यों पर बल दिया
है।
- जो अपना नही है उसे प्राप्त करने की इच्छा करना भी चोरी
है।
श्रीमद्भागवत् में तो कहा है- अपने जीवन-निर्वाह की आवश्यकता से अधिक जो
अपने पास
रखता है अर्थात दान नहीं करता वह – चोरी के धन का ही उपयोग करता
है।
स्वामी विवेकानंद
”पत्थर की मांशपेशियाँ और फौलाद के भुजदण्ड” मन से
छिछली भावुक्ता के प्रवाह को निरूद्ध करने में समर्थ और बुद्धि से विभिन्न प्रकार
की शिक्षा- कला तथा वैज्ञानिक विद्याओं को आत्मसात् करने को तत्पर-विद्यार्थी -जीवन
में इन गुणों के विकास के लिए ही ब्रह्मचर्य को जीवन- मूल्यों के रूप में अपनाने की
आवश्यकता को रेखांकित किया गया था।
श्री कृष्ण के शब्दो में
- ”धर्म
विरूद्धों भूतेषु कामोडस्मि भरतर्षम” -गीता
बौद्धधर्म के सुत्तनिपात, खुदुकपाठ
इत्यादि ग्रन्थों में भगवान बुद्ध की देशना के अर्न्तगत मैत्री, करूणा, उपकार,
जीवदया, आदि गुणों पर बार-बार बल दिया गया है।
श्रीमद्भागवत गीता (17-14-16)
में शारीरिक, वाचिक व मानसिक तीन प्रकार के तपो का
उल्लेख है:-
32।171 –
क़ायिक तप: ईश्वर, विद्वान महापुरूषों तथा गुरूजनों का पूजन, ब्रह्मचर्य,
अहिंसा।
32।17।2 – वाचिक तप: प्रीतिकर, सत्य, प्रिय ओर हितकारी वाक्य, स्वाध्याय
का अभ्यास।
32।17।3 – मानसिक तप: प्रसन्न मन एकता, सौम्यत्व, मौन (मित भाषण)
आत्मसंयम, विचारो भावो की पवित्रता।
तैतरीय उपनिषद के प्रसिद्ध वचन है :
मातृदेवो भव:, पितृदेवोभव:, आचार्यदेवोभव:, अतिथिदेवोभव:।”स्वाध्यायन्मा
प्रमद:”
अहम् से वयम् की यात्रा मानव जीवन का लक्ष्य है और यही लक्ष्य शिक्षा
का है।
- मूल्य परक शिक्षा इस यात्रा में उसका पथ प्रदर्शन करती है।
- शरीर,
प्राण, मन, बुद्धि तथा आत्मा। पांच अंगों से पांच आधारभूत मूल्य नि:सृत होते
है-
सक्षमता, संतुलन, संयम, सत्यान्वेषण, (विवेक) तथा सेवा।
धृति, क्षमा,
दान, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य एवं आक्रोध इन दस गुणों का
मिलान यहुदियों, ईसाईयों के दस आदेशों से किया जा सकता है
सत्यं, शिवम्
सुन्दरम् ये तीनों गुण क्रम से ज्ञान इच्छा तथा क्रिया के प्रतीक है।
दैत्यराज
प्रहलाद ने प्राथमिकता के आधार पर शील, धर्म, सत्य, सदाचार, सबलता पांच गुण गिनाये
है।
पंतजलि ने अध्यात्मिक विकास के लिए अष्टांग मार्ग को प्रस्तुत किया है तथा
जीवनमूल्यों का वैयक्तिक तथा सामाजिक दो भागों में विभाजन किया है।
श्री
अरविन्द के अनुसार
-जबसे जीवन मूल्यों का शिक्षा से विछोह हो गया है तबसे
देशवासी ”धर्मभ्रष्ट तथा लक्ष्यभ्रष्ट” हो गये है।
विभिन्न आयोगों की
अनुशंसाएँ
- राधाकृष्ण आयोग के अनुसार धर्म के प्रति जो भारतीय दृष्टिकोण है
उसमें और धर्मनिरपेक्षता- (सर्वधर्म समभाव) में काई अन्तर नहीं है। भारत में धर्म
की शिक्षा का आधार आध्यात्मिकता है, बिना आध्यात्मिकता के नैतिक जीवन मूल्यों का
विकास सम्भव नहीं। धार्मिकता से अभिप्राय आध्यात्मिकता माना जाए, अत: धार्मिक
शिक्षा का अर्थ अध्यात्मिक शिक्षा होना चाहिए।
राधाकृष्ण आयोग ने धार्मिक,
नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए जो सुझाव दिये है वह इस प्रकार है:-
- सभी
शिक्षण संस्थाओं में कुछ मिनटों तक छात्र मौन रहकर ध्यान करें और फिर इसके बाद
शिक्षण कार्य प्रारम्भ हो। इसमें शिक्षक भी शामिल हो।
- विभिन्न धर्मो के
तुलनात्मक अध्ययन की दृष्टि से उनसे सम्बन्धित ग्रन्थों (जैसे – गीता,
बाइबिल,
कुरान, गुरूग्रन्थ साहिब, धम्मपद आदि) के सारभूत अंश छात्रों को पढ़ाया जाए।
मृदलियार आयोग(52-53)- विद्यालयों में सामूहिक प्रार्थना और प्ररेक प्रसंगों को भी
महत्व दिया जाए। परिवार समाज और विद्यालय का परिवेश बालकों के नैतिक एवं चरित्र
विकास में सहायक हो।
- नैतिकता तथा आध्यात्मिकता का छात्रों के चरित्र निर्माण
में सहायक होना चाहिए।
कोठारी आयोग-(64-66) – के अनुसार नैतिक आध्यात्मिक
विकास के लिए सर्वधर्म समभाव की शिक्षा छात्रों को दी जाये, धार्मिक शिक्षा से
तात्पर्य नैतिक शिक्षा है। जिससे उनमें विभिन्न वर्गो की अच्छी बातों को ग्रहण करके
अपने चरित्र का निर्माण करे, देश के उत्थान में योगदान दें तथा मानव-कल्याण के लिए
अग्रसर हों।
Wednesday, December 22, 2010
चीन के स्कूलों में छात्रों को वैज्ञानिक शिक्षा देने का नया उपाय
यह सर्व विदित है कि वैज्ञानिक शिक्षा किसी देश के विकास की नींव होती है और बच्चों
में विज्ञान की शिक्षा के प्रचार का विशेष महत्व होता है। इधर के वर्षों में चीन के
विभिन्न क्षेत्रों के मिडिल व प्राइमरी स्कूलों के छात्रों में जोर-शोर से
वैज्ञानिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है । अब तक परंपरा यह रही है कि
स्कूलों में अध्यापक छात्रों को विभिन्न जानकारियां दें, लेकिन आधुनिक समय में यह
विचार भी बदलने लगा है। आधुनिक शिक्षा का विचार है कि छात्रों में स्वेच्छा से
जानकारी पाने की शक्ति होनी चाहिये। इसके लिए चीन के कुछ स्कूलों को आदर्श बनाया
गया है। ऐसी एक मिसाल पूर्वी चीन के शानतुंग प्रांत के चीनान शहर के शीचैन प्राइमरी
स्कूल की है जिसने छात्रों को वैज्ञानिक शिक्षा देने का नया उपाय ढ़ूंढ़ा है। इस
स्कूल में छात्रों के लिए प्रति हफ्ते कई घंटों की विज्ञान व तकनीक की कक्षाएं लगती
हैं। इन कक्षाओं में वे पुस्तकों से ही नहीं ज्ञान नहीं पाते, स्वयं भी वैज्ञानिक
परीक्षण करते हैं। इस स्कूल की पांचवीं कक्षा के एक छात्र कोतुंग ने गौरव के साथ
बताया कि वह वहां खुद रोबोट बनाता है। उसका बनाया रोबोट न केवल चल सकता है ,चीज़ों
को पकड़ तक सकता है और अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं से बच भी सकता है। कोतुंग
ने बताया कि एक दिन उसने अपनी मां को घर में सफाई करते देखा , तो उस के दिमाग में
अचानक यह विचार आया कि वह एक रोबोट बनाए जो मां की जगह घर की सफाई कर सके। इसके बाद
कोगुंत ने अपने कुछ घनिष्ठ मित्रों को यह विचार बताया और वे सब ऐसा रोबोट बनाने पर
सहमत हुए। कोतुंग के अध्यापक ने अपने छात्रों के इस विचार की प्रशंसा की और उन के
इस कामकाज को ठोस समर्थन दिया। कोतुंग और उस के मित्रों ने अध्यापक से कंप्यूटर,
इलेक्ट्रोनिक्स व मशीनरी की जानकारी पाने के बाद एक रोबोट बनाना शुरू किया। उन्हों
ने एक सच्चे इंजीनियर की तरह रोबोट का डिजाइन तैयार किया। इसमें मुसीबतें आईं, तो
उन्हों ने खुद पुस्तकों से उनका जवाब तलाशने की कोशिश की। और अन्त में वे अपनी ही
शक्ति के बूते यह रोबोट बनाने में सफल हुए। इन छात्रों की इस रचना पर समाज का
व्यापक ध्यान भी गया। बहुत से लोग इस रोबोट को देखने स्कूल आये। चीनी रक्षा
विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्री मा हूंगश्वे ने रोबोट देखकर बड़ी खुशी से कहा कि
प्राइमरी स्कूल के इन कुछ छात्रों का विचार बहुत गहरा है। रोबोट बनाने को उन्होंने
उन के दिमाग और कौशल के सुधार के लिए बहुत अच्छा बताया। रोबोट के अलावा इस स्कूल के
छात्रों ने स्वचालित कप , नाचने वाला सिक्का और आग से चलने वाला छोटा गुब्बारा भी
बनाया। स्कूल में हाल ही में हुई वैज्ञानिक रचना प्रदर्शनी में उन्होंने ऐसे
सैकड़ों स्वनिर्मित गुब्बारे आकाश में छोड़े। ये गुब्बारे प्लास्टिक, रबड़ और लोहे
की बोतल से निर्मित हैं और इनमें अल्कोहल को ईंधन की तरह इस्तेमाल किया गया है।
छात्रों ने बताया कि उन्होंने ऐसे गुब्बारे के निर्माण में मौजूद अनेक कठिनाइयों को
दूर कर लिया है और इन कठिनाइयों का हल करने के दौरान बहुत कुछ सीखा भी। इस स्कूल की
प्रधान सुश्री मा लीश्या के अनुसार उन का स्कूल वैज्ञानिक परीक्षण तथा छात्रों के
अपने हाथ से किये गये काम को बहुत महत्वपूर्ण मानता है। इस से छात्रों की गुणवत्ता
को उन्नत होती है और उनमें बचपन से ही विज्ञान के प्रति गहरी रुचि जगने लगती है, जो
उन की पूरी जिंदगी के लिए लाभदायक साबित हो सकती है। नीचे आप उक्त कहानी से जुड़े
चीन में गुणी शिक्षा तथा बाल बच्चों की गुणवत्ता को उन्नत करने के कुछ कार्यों पर
नज़र डाल दें । पिछले दो सालों में चीन ने गुणी शिक्षा को अमल में लाने की
सकारात्मक कोशिश की है , और इस संदर्भ में उल्लेखनीय प्रगति भी प्राप्त की । चीन की
शिक्षा मंत्री सुश्री चेन ने कहा कि उन्हों ने कहा कि वर्ष दो हजार एक से चीन को
गुणी शिक्षा के अपने अभियान में महत्वपूर्ण प्रगति मिलती शुरू हुई । प्राइमरी व
मिडिल स्कूलों में नयी पाठ्य पुस्तकों का प्रयोग शुरू हो गया है और हाई स्कूलों में
नये तरीके की कक्षाओं का अनुशीलन व परीक्षण भी शुरू हुआ है । साथ ही देश के
प्राइमरी व मिडिल स्कूलों में नैतिक शिक्षा का सुधार भी शीघ्रता से आगे बढ़ा है ।
इधर खेल , संगीत व चित्रकला जैसी कक्षाओं का नया मापदंड और छात्रों का स्वास्थ्य
मापदंड भी तैयार किया जा चुका है । एक ताजा सर्वेक्षण कहता है कि चीन के 3 से 18
वर्ष की उम्र वाले बच्चों में से आधे , या तो दूसरों के साथ सहयोग करने में असमर्थ
हैं , या श्रम से प्रेम नहीं करते हैं , या मनोवैज्ञानिक तौर पर हद से ज्यादा कमजोर
हैं । इसी स्थिति को देखते हुए चीन के राष्टीय महिला संघ और चीनी शिक्षा मंत्रालय
ने देश के बच्चों के नैतिक बल को उन्नत करने के लिये गत फरवरी से चीनी लघु नागरिक
नैतिकता निर्माण योजना शुरू की । चीन की कोई तीस करोड़ आबादी ऐसी हैं , जिस की औसत
उम्र 18 साल के नीचे है । चीन सरकार ने पिछली शताब्दी में परिवार नियोजन का जो
राष्टीय सिद्धांत लागू किया , उस के तहत एक परिवार में एक ही बच्चा होने की
व्यवस्था है । इसलिये वर्तमान में भी चीनी शहरों के अधिकांश परिवार इकलौती संतान
वाले नजर आते हैं । ऐसे इक्लौते बच्चों को अपने माता पिता के अतिरिक्त , दादा दादी
, नाना नानी भी हैं , यानी सब परिवार के सभी सदस्य इस अकेले बच्चे को प्रेम करते
हैं । लेकिन हद से ज्यादा प्रेम से बच्चों के प्रशिक्षण के लिये बाथक बन जाता है ,
कारण यह है कि वे ये स्वयं को दुनिया का केंद्र मानने लगते हैं , और दूसरों पर
ध्यान नहीं देते । इस नैतिक मनोवैज्ञानिक समस्या के समाधान के लिये चीन के प्राइमरी
स्कूलों में नैतिक कक्षाएं खोली गयीं , और अब लघु नागरिक नैतिकता निर्माण जैसी
योजना लागू की गयी । इन सब का लक्ष्य चीनी बच्चों को बुनियादी सामाजिक मल्यों में
दीक्षित करना व जिम्मेदारी का भाव पैदा करना है । चीनी महिला संघ की उपाध्यक्षा
सुश्री गू श्यू ल्यैन ने कहा कि चीन की लघु नागरिक नैतिकता निर्माण योजना का देश
जनता से बहुत लोकप्रिय है , और इस का लक्ष्य चीनी बच्चों की नैतिक गुणवता को उन्नत
करना और उन्हें उदार विचारधारा कायम करना है । इस योजना का नारा है - घर में माता
पिता के लघु सहायक बनें , स्कूल में सहपाठियों के मित्र बनें , समाज में दूसरों की
मदद करने वाले हों तथा जीवन में पर्यावरण के लघु रक्षक ।
में विज्ञान की शिक्षा के प्रचार का विशेष महत्व होता है। इधर के वर्षों में चीन के
विभिन्न क्षेत्रों के मिडिल व प्राइमरी स्कूलों के छात्रों में जोर-शोर से
वैज्ञानिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है । अब तक परंपरा यह रही है कि
स्कूलों में अध्यापक छात्रों को विभिन्न जानकारियां दें, लेकिन आधुनिक समय में यह
विचार भी बदलने लगा है। आधुनिक शिक्षा का विचार है कि छात्रों में स्वेच्छा से
जानकारी पाने की शक्ति होनी चाहिये। इसके लिए चीन के कुछ स्कूलों को आदर्श बनाया
गया है। ऐसी एक मिसाल पूर्वी चीन के शानतुंग प्रांत के चीनान शहर के शीचैन प्राइमरी
स्कूल की है जिसने छात्रों को वैज्ञानिक शिक्षा देने का नया उपाय ढ़ूंढ़ा है। इस
स्कूल में छात्रों के लिए प्रति हफ्ते कई घंटों की विज्ञान व तकनीक की कक्षाएं लगती
हैं। इन कक्षाओं में वे पुस्तकों से ही नहीं ज्ञान नहीं पाते, स्वयं भी वैज्ञानिक
परीक्षण करते हैं। इस स्कूल की पांचवीं कक्षा के एक छात्र कोतुंग ने गौरव के साथ
बताया कि वह वहां खुद रोबोट बनाता है। उसका बनाया रोबोट न केवल चल सकता है ,चीज़ों
को पकड़ तक सकता है और अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं से बच भी सकता है। कोतुंग
ने बताया कि एक दिन उसने अपनी मां को घर में सफाई करते देखा , तो उस के दिमाग में
अचानक यह विचार आया कि वह एक रोबोट बनाए जो मां की जगह घर की सफाई कर सके। इसके बाद
कोगुंत ने अपने कुछ घनिष्ठ मित्रों को यह विचार बताया और वे सब ऐसा रोबोट बनाने पर
सहमत हुए। कोतुंग के अध्यापक ने अपने छात्रों के इस विचार की प्रशंसा की और उन के
इस कामकाज को ठोस समर्थन दिया। कोतुंग और उस के मित्रों ने अध्यापक से कंप्यूटर,
इलेक्ट्रोनिक्स व मशीनरी की जानकारी पाने के बाद एक रोबोट बनाना शुरू किया। उन्हों
ने एक सच्चे इंजीनियर की तरह रोबोट का डिजाइन तैयार किया। इसमें मुसीबतें आईं, तो
उन्हों ने खुद पुस्तकों से उनका जवाब तलाशने की कोशिश की। और अन्त में वे अपनी ही
शक्ति के बूते यह रोबोट बनाने में सफल हुए। इन छात्रों की इस रचना पर समाज का
व्यापक ध्यान भी गया। बहुत से लोग इस रोबोट को देखने स्कूल आये। चीनी रक्षा
विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्री मा हूंगश्वे ने रोबोट देखकर बड़ी खुशी से कहा कि
प्राइमरी स्कूल के इन कुछ छात्रों का विचार बहुत गहरा है। रोबोट बनाने को उन्होंने
उन के दिमाग और कौशल के सुधार के लिए बहुत अच्छा बताया। रोबोट के अलावा इस स्कूल के
छात्रों ने स्वचालित कप , नाचने वाला सिक्का और आग से चलने वाला छोटा गुब्बारा भी
बनाया। स्कूल में हाल ही में हुई वैज्ञानिक रचना प्रदर्शनी में उन्होंने ऐसे
सैकड़ों स्वनिर्मित गुब्बारे आकाश में छोड़े। ये गुब्बारे प्लास्टिक, रबड़ और लोहे
की बोतल से निर्मित हैं और इनमें अल्कोहल को ईंधन की तरह इस्तेमाल किया गया है।
छात्रों ने बताया कि उन्होंने ऐसे गुब्बारे के निर्माण में मौजूद अनेक कठिनाइयों को
दूर कर लिया है और इन कठिनाइयों का हल करने के दौरान बहुत कुछ सीखा भी। इस स्कूल की
प्रधान सुश्री मा लीश्या के अनुसार उन का स्कूल वैज्ञानिक परीक्षण तथा छात्रों के
अपने हाथ से किये गये काम को बहुत महत्वपूर्ण मानता है। इस से छात्रों की गुणवत्ता
को उन्नत होती है और उनमें बचपन से ही विज्ञान के प्रति गहरी रुचि जगने लगती है, जो
उन की पूरी जिंदगी के लिए लाभदायक साबित हो सकती है। नीचे आप उक्त कहानी से जुड़े
चीन में गुणी शिक्षा तथा बाल बच्चों की गुणवत्ता को उन्नत करने के कुछ कार्यों पर
नज़र डाल दें । पिछले दो सालों में चीन ने गुणी शिक्षा को अमल में लाने की
सकारात्मक कोशिश की है , और इस संदर्भ में उल्लेखनीय प्रगति भी प्राप्त की । चीन की
शिक्षा मंत्री सुश्री चेन ने कहा कि उन्हों ने कहा कि वर्ष दो हजार एक से चीन को
गुणी शिक्षा के अपने अभियान में महत्वपूर्ण प्रगति मिलती शुरू हुई । प्राइमरी व
मिडिल स्कूलों में नयी पाठ्य पुस्तकों का प्रयोग शुरू हो गया है और हाई स्कूलों में
नये तरीके की कक्षाओं का अनुशीलन व परीक्षण भी शुरू हुआ है । साथ ही देश के
प्राइमरी व मिडिल स्कूलों में नैतिक शिक्षा का सुधार भी शीघ्रता से आगे बढ़ा है ।
इधर खेल , संगीत व चित्रकला जैसी कक्षाओं का नया मापदंड और छात्रों का स्वास्थ्य
मापदंड भी तैयार किया जा चुका है । एक ताजा सर्वेक्षण कहता है कि चीन के 3 से 18
वर्ष की उम्र वाले बच्चों में से आधे , या तो दूसरों के साथ सहयोग करने में असमर्थ
हैं , या श्रम से प्रेम नहीं करते हैं , या मनोवैज्ञानिक तौर पर हद से ज्यादा कमजोर
हैं । इसी स्थिति को देखते हुए चीन के राष्टीय महिला संघ और चीनी शिक्षा मंत्रालय
ने देश के बच्चों के नैतिक बल को उन्नत करने के लिये गत फरवरी से चीनी लघु नागरिक
नैतिकता निर्माण योजना शुरू की । चीन की कोई तीस करोड़ आबादी ऐसी हैं , जिस की औसत
उम्र 18 साल के नीचे है । चीन सरकार ने पिछली शताब्दी में परिवार नियोजन का जो
राष्टीय सिद्धांत लागू किया , उस के तहत एक परिवार में एक ही बच्चा होने की
व्यवस्था है । इसलिये वर्तमान में भी चीनी शहरों के अधिकांश परिवार इकलौती संतान
वाले नजर आते हैं । ऐसे इक्लौते बच्चों को अपने माता पिता के अतिरिक्त , दादा दादी
, नाना नानी भी हैं , यानी सब परिवार के सभी सदस्य इस अकेले बच्चे को प्रेम करते
हैं । लेकिन हद से ज्यादा प्रेम से बच्चों के प्रशिक्षण के लिये बाथक बन जाता है ,
कारण यह है कि वे ये स्वयं को दुनिया का केंद्र मानने लगते हैं , और दूसरों पर
ध्यान नहीं देते । इस नैतिक मनोवैज्ञानिक समस्या के समाधान के लिये चीन के प्राइमरी
स्कूलों में नैतिक कक्षाएं खोली गयीं , और अब लघु नागरिक नैतिकता निर्माण जैसी
योजना लागू की गयी । इन सब का लक्ष्य चीनी बच्चों को बुनियादी सामाजिक मल्यों में
दीक्षित करना व जिम्मेदारी का भाव पैदा करना है । चीनी महिला संघ की उपाध्यक्षा
सुश्री गू श्यू ल्यैन ने कहा कि चीन की लघु नागरिक नैतिकता निर्माण योजना का देश
जनता से बहुत लोकप्रिय है , और इस का लक्ष्य चीनी बच्चों की नैतिक गुणवता को उन्नत
करना और उन्हें उदार विचारधारा कायम करना है । इस योजना का नारा है - घर में माता
पिता के लघु सहायक बनें , स्कूल में सहपाठियों के मित्र बनें , समाज में दूसरों की
मदद करने वाले हों तथा जीवन में पर्यावरण के लघु रक्षक ।
Monday, December 20, 2010
अहिले हाम्रो देश राजतन्त्रको अन्त्यपछि संघीय लोकता...
अहिले हाम्रो देश राजतन्त्रको अन्त्यपछि संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रमा प्रवेश
गरेको छ । साथै शान्तिपूर्ण तरिकाले राजतन्त्रको अन्त्यपछि शान्तिपूर्ण
जनक्रान्तिको चरण पनि सुरु भएको छ । परिवर्तित परिस्थितिअनुरूप पार्टीका कतिपय
नीति, विचार, सिद्धान्त परिवर्तित तथा विकसित भएका छन् । नेपाली जनता र भारतीय
जनताबीचको सम्बन्ध इतिहासभन्दा पहिलेको हो । यो सम्बन्ध ज्यादै मित्रतापूर्ण,
सौहार्दपूर्ण र घनिष्ट रहेको छ । भारतीय सरकारसँग भने नेपालको सम्बन्ध कहिले राम्रो
कहिले नराम्रो हुँदै आएको कटु सत्य हो । अहिले नेपाली पक्षले भारत सरकारबाट ठगिएको,
हेपिएको र असमान व्यवहार व्यहोर्नुपरेको महसुुस गरिरहेको छ । सन् १९५० र त्यसयताका
पनि सन्धि-सम्झौता असमान छन् भन्नेमा नेपाली जनता सचेत छन् । शदीयाँै मात्र होइन,
सहश्राब्दीयौँदेखि दुवै देशका जनताको बीचमा बन्द-व्यापार भइरहेको र धर्म-संस्कृतिको
आदान-प्रदान हुँदै आएको छ । यिनै परम्परा र सम्बन्धले गर्दा नेपालीहरूको उल्लेख्य
संख्या भारतका उत्पादन सुरक्षा र सेवाका क्षेत्रमा कार्यरत छ । जहाँ आफ्ना जनता
त्यहाँ पार्टी-काम स्वाभाविक भएको छ, त्यसैले कसै-कसैले नचाहेर पनि यस्ता
पार्टी-काम सम्पन्न हुँदै आएका छन् ।
नेपाली जनताले प्राचीन, अर्वाचीन र आधुनिक
भारत निर्माणमा मात्र होइन, भारतको सीमाको रक्षाका निम्ति पनि सीप, पसिना र रगत
बगाएका छन् । भारतको प्रत्येक वर्ग, इन्चको क्षेत्रमा नेपाली जनताको एक थोपा रगत र
एक मुठी पसिना पोखिएको छ भन्नुपर्दा अतिशयोक्ति हुने छैन । माक्र्सवादी दर्शनअनुसार
हरेक श्रमिकले ज्यालाबापत आफ्नै कमाइ प्राप्त गर्दछ, प्रवासी नेपालीले पनि यहाँबाट
आफ्नै कमाइ पाइरहेका छन् । नेपालमा माओवादी युद्ध भइरहेका वेला दिल्लीमा मात्र ६
लाख नेपाली युवा रोजगारीका लागि आएका छन् भन्ने सुनिएको थियो । अहिले सो संख्या कति
छ भन्न सक्दिनँ । भारतभरि कहिलेकाहीँ करिब एक करोड नेपाली रोजगारीका लागि आउँछन्
भन्ने पनि सुनिएको हो । तीन करोड जनसंख्यामा एक करोडको कुरा ज्यादै ठूलो संख्या
मान्नुपर्छ । यस्तो अवस्थामा जनता सँगसँगै हाम्रो पार्टी पनि आउने नै भयो । जहाँ
जनता त्यहाँ पार्टी भएपछि यसलाई अन्यथा लिनु भएन । जुन देशमा हामी बस्छाँै त्यहाँको
कानुन पालनामा एकदमै सचेत हुनुपर्छ । खासगरी हाम्रा प्रवासी कमरेडहरूले तीनवटा
क्षेत्रमा ध्यान दिनुपर्छ र काम पनि ती क्षेत्रमै केन्दि्रत गर्नुपर्छ । तीमध्ये
एउटा क्षेत्र हो भारत प्रवासमा रहेका सबै नेपालीको हकहितको रक्षा गर्ने, अर्को हो-
भारतीय श्रमजीवी जनतासँग घनिष्ट सम्बन्ध बनाउने र तेस्रो- नेपालमा सञ्चालन गरिने
आन्दोलन परिवर्तन विकास र निर्माणमा सहभागिता समर्थन र ऐक्यबद्धता जनाउने
।
भारतमा नेपाली जनता कलकारखानामा कष्टकर मजदुरी गर्ने, अपमानित भएर पनि घरेलु
कामदार हुने र कुल्ली दरवान र चौकीदार भएर काम गर्ने गर्छन् । एउटा नेपाली हिस्सा
भारतीय सेनामा पनि कार्यरत छ । अहिले आएर नेपालीको एउटा ज्यादै सानो हिस्सा
उद्योग-धन्दा र बन्द-व्यापारमा पनि लागेका छन् । यसको संख्या नगन्य नै रहेको छ । के
तपाइर्ंहरूले योजनाबद्ध रूपमा यी समुदायबीच कहिल्यै काम गर्नुभएको छ ? अहँ
गर्नुभएको छैन । तपाइर्ंहरू कमिटीमा पार्टीकेन्द्रका यस्ता र उस्ताबाहेक अरू छलफल
नै गर्नुहुन्न किन ? किनकि तपाईहरूले यहाँका नेपाली श्रमिकको ठोस समस्यालाई हल
गर्ने संगठित प्रयत्न कहिल्यै गर्नुभएको छैन । कामै नगरेपछि कसरी संगठन विस्तार हुन
सक्छ ? यस्तो अवस्थामा भएको पनि बिगँ्रदै जानेछ ।
अर्को कामको क्षेत्र हो,
भारतीय जनतासँग सु-सम्बन्ध विस्तार गर्ने । भारतका जनता र शासकसँगको सम्बन्धलाई
सगोलमा हेर्नुहुन्न । भारत औपचारिक लोकतान्त्रिक मुलुक हो । लोकतन्त्रका उदार
सिद्धान्त पनि यहाँ क्रियाशील छन् । औपचारिक लोकतन्त्रका घीनलाग्दा उदाहरण पनि यहाँ
पाउन सकिन्छ । तर, श्रमिकलाई संगठित गर्न र संगठित रूपमा आफ्ना अधिकारको एक हदसम्म
संुरक्षण गर्न तिनै उदार पक्षलाई प्रयोग गर्न सकिन्छ । भारत औद्योगिक मुलुक पनि
भएकाले ठूलो संख्यामा श्रमिकको उपस्थिति छ । सबै व्यवसाय र वर्ग तथा तहका जनता यहाँ
संगठित छन् । हामीले यिनै श्रमिक संगठन, यी संगठनका पक्षधर राजनीतिक पार्टी र अन्य
सामाजिक संघसंस्थामार्फत पनि आफ्नो सम्बन्ध सुदृढ गर्ने कोसिस गर्नुपर्छ । हामीले
अन्तर्राष्ट्रिय श्रमिक संगठनसँग पनि सम्बन्ध कायम गर्नुपर्छ । सबै संस्थासँग
सम्बन्ध कायम गरेर नेपाली श्रमिकको हक-हितको संरक्षण गर्न लागिपर्नुपर्छ
।
भारतीय जनतालाई नेपाली जनता राष्ट्रवादी किन छन् भन्नेबारे जानकारी दिन पनि
जरुरी छ । हामी आधुनिक संसारमा कहिल्यै पनि कुनै पनि उपनिवेशका दास भएनौँ । हाम्रो
देश इतिहासको कुनै पनि कालखण्डमा कसैको उपनिवेश भएन । हाम्रो स्वाभिमान उच्च छ ।
पुराना सन्धि-सम्झौताले पनि हामीलाई -यता उताका श्रमिकलाई) रोजगारीको खोजीमा भारत
आउन प्रेरित गरेको हो । तिनै आधारमा भारतबाट पनि नेपालमा लाखाँै व्यक्ति अनेक
व्यवसायमा संलग्न हुन जाने/आउने गर्छन् । राजनीतिक पार्टीसँग पनि हामीले आफ्ना
विचारका बारेमा चर्चा गर्नुपर्छ र हाम्रो स्वतन्त्रता, अखण्डता र सार्वभौमिकताप्रति
हाम्रो अगाध प्रेम र समर्पण छ भनेर जानकारी गराउनुपर्छ । यसो गरेर हामीले सबै
किसिमको सहयोगका लागि मित्र तयार गर्न सक्छौँ । सबै हाम्रा मित्र बन्न तयार
नहोलान्, तर हामीजस्तै संघसंस्था हाम्रा मित्र बन्नेछन् । यस दिशामा हामीले खासै
प्रयत्न गरेजस्तो लाग्दैन । मेरो विचारमा अब हामीले यतातिर पनि काम गर्न ध्यान
दिनैपर्छ । प्रवासी नेपालीबाहेक भारतीय नेपालीको पनि यहाँ ठूलो संख्या छ र भारतीय
नेपाली नेपाली भाषा, साहित्य, कला र संस्कृतिको संरक्षण र सम्बर्धन गर्न क्रियाशील
छन् । उनीहरूसँग पनि सम्बन्ध विकास गर्ने र प्रवासी नेपालीका हक-हितका पक्षमा आवाज
उठाउन प्रेरित गर्नुपर्छ । यो पनि महत्त्वपूर्ण काम हुनेछ ।
प्रवासी नेपालीका
तर्फबाट गरिने योगदानको तेस्रो क्षेत्र हो नेपालमा सञ्चालित जनताको आन्दोलन, त्यसको
निर्माण र विकासप्रति ऐक्यबद्धता, सहयोग र समर्थन । भारत प्रवासमा रहेर नेपालीले
ज्यादै ठुल्ठूला योगदान गरेका छन् । सन् १९४९ मा कमरेड पुष्पलालले नेपाल कम्युनिस्ट
पार्टी गठन गर्दा कोलकाताका प्रवासी नेपालीले ठूलो योगदान गरेका थिए । तत्कालीन
राणाशाही शासन रहेका बखत भारत प्रवासमा कम्युनिस्ट पार्टी मात्र होइन, पँुजीवादी
पार्टी नेपाली कांग्रेस पनि जन्मेको हो । त्यसवेला अंग्रेजको उपनिवेशबाट भारत
स्वतन्त्र भएको थियो । त्यो परिस्थितिलाई उपयोग गरेर नेपालका राजनीतिक पार्टीले
भारतमा आश्रय लिएका थिए र उनीहरूको सहयोगमा ती पार्टीका कतिपय कामलाई व्यवस्थित पनि
गरिएको थियो ।
२००७ सालको अधुरो क्रान्तिमा पनि भारतस्थित प्रवासी नेपालीले
उल्लेखनीय भूमिका खेलेका थिए । ०१७ सालपछि निरंकुश राजतन्त्रात्मक पञ्चायती
शासनकालमा पनि निर्वासित राजनीतिक पार्टीका नेता-कार्यकर्तालाई आश्रय दिने र सहयोग
गर्ने काममा यहाँका प्रवासी नेपालीको ठूलै योगदान रह्यो । प्रवासी नेपालीले संगठित
रूपमा योगदान भने ०२५ सालदेखि कमरेड एकदेव आलेको नेतृत्वमा प्रवासी नेपाली
कल्याणकारिणी समिति निर्माण भएपछि सुरु भएको हो । त्यसयताका सबै नेपाली जनताका
संघर्षमा कुनै न कुनै हिसाबले प्रवासी नेपालीको संलग्नता रहेको छ । ०४७ सालपछि त आम
निर्वाचनमा पार्टीका उम्मेदवारलाई जिताउने उद्देश्य राखेर नेपाल जाने काम पवित्र
तीर्थयात्राजस्तै भयो । ०६२/६३ को ऐतिहासिक संयुक्त जनआन्दोलन सफल बनाउन प्रवासी
नेपालीको उल्लेख्य भूमिका रह्यो । त्यही आन्दोलनको पृष्ठभूमिमा नेपालमा दुई सय ४०
वर्षको शाहवंशीय राजतन्त्र उन्मूलन पनि भएको हो ।
अहिले हाम्रो देशमा
उथल-पुथलपूर्ण राजनीतिक घटनात्र mमबीच संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रको संक्रमणकाल
गुजँ्रदै छ । राजतन्त्र अन्त्य भए पनि सामन्तवाद, दलाल नोकरशाही पुँजीवाद र वैदेशिक
हस्तक्षेप र शोषण अन्त्य भएको छैन । धेरै उज्ज्वल सम्भावना र कठिन चुनौतीका बीच
हाम्रो देश अगाडि बढ्दै छ । राजतन्त्रको अन्त्यसँगै हाम्रो समाज शान्तिपूर्ण
जनक्रान्तिको चरणमा प्रवेश गरेको छ । बुद्धिमतापूर्ण ढंगबाट अगाडि बढ्न सकियो भने
शान्तिपूर्ण रूपमा जनवादी क्रान्ति सम्पन्न गरी हाम्रो देश जनताको बहुदलीय जनवादको
उज्ज्वल भविष्यमा प्रवेश गर्ने पक्का छ । अहिले हाम्रो समाजकै सबभन्दा प्रमुख काम
आगामी पाँच महिनाभित्र नयाँ संविधान जारी गर्ने र माओवादी सेनाको टुंगो लगाएर दिगो
शान्ति प्राप्त गर्ने हो । हाम्रो पार्टीले पाँच कार्यभार अगाडि सारेको छ । तर,
केन्द्रीय कार्यभार भने नयाँ संविधान जारी गर्ने र शान्तिप्रक्रियाको टुंगो लगाउने
कुरा नै हो । त्यसो भएर भारत प्रवासमा रहेका सम्पूर्ण कमरेडले यही केन्द्रीय
कार्यभार पूरा गर्न आफ्नोतर्फबाट सक्दो योगदान गर्नुपर्छ । यो कार्यभार पूरा गर्न
पनि नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलनमा देखा परेका उग्रवामपन्थी अराजकतावाद र दक्षिणपन्थी
यथास्थितिवादका विरुद्ध संघर्ष तेज गर्न जरुरी छ । यसो गर्दै शान्तिपूर्ण
जनक्रान्ति सम्पन्न गर्न महत्त्वपूर्ण योगदान गर्न आह्वान पनि गर्दछु ।
गरेको छ । साथै शान्तिपूर्ण तरिकाले राजतन्त्रको अन्त्यपछि शान्तिपूर्ण
जनक्रान्तिको चरण पनि सुरु भएको छ । परिवर्तित परिस्थितिअनुरूप पार्टीका कतिपय
नीति, विचार, सिद्धान्त परिवर्तित तथा विकसित भएका छन् । नेपाली जनता र भारतीय
जनताबीचको सम्बन्ध इतिहासभन्दा पहिलेको हो । यो सम्बन्ध ज्यादै मित्रतापूर्ण,
सौहार्दपूर्ण र घनिष्ट रहेको छ । भारतीय सरकारसँग भने नेपालको सम्बन्ध कहिले राम्रो
कहिले नराम्रो हुँदै आएको कटु सत्य हो । अहिले नेपाली पक्षले भारत सरकारबाट ठगिएको,
हेपिएको र असमान व्यवहार व्यहोर्नुपरेको महसुुस गरिरहेको छ । सन् १९५० र त्यसयताका
पनि सन्धि-सम्झौता असमान छन् भन्नेमा नेपाली जनता सचेत छन् । शदीयाँै मात्र होइन,
सहश्राब्दीयौँदेखि दुवै देशका जनताको बीचमा बन्द-व्यापार भइरहेको र धर्म-संस्कृतिको
आदान-प्रदान हुँदै आएको छ । यिनै परम्परा र सम्बन्धले गर्दा नेपालीहरूको उल्लेख्य
संख्या भारतका उत्पादन सुरक्षा र सेवाका क्षेत्रमा कार्यरत छ । जहाँ आफ्ना जनता
त्यहाँ पार्टी-काम स्वाभाविक भएको छ, त्यसैले कसै-कसैले नचाहेर पनि यस्ता
पार्टी-काम सम्पन्न हुँदै आएका छन् ।
नेपाली जनताले प्राचीन, अर्वाचीन र आधुनिक
भारत निर्माणमा मात्र होइन, भारतको सीमाको रक्षाका निम्ति पनि सीप, पसिना र रगत
बगाएका छन् । भारतको प्रत्येक वर्ग, इन्चको क्षेत्रमा नेपाली जनताको एक थोपा रगत र
एक मुठी पसिना पोखिएको छ भन्नुपर्दा अतिशयोक्ति हुने छैन । माक्र्सवादी दर्शनअनुसार
हरेक श्रमिकले ज्यालाबापत आफ्नै कमाइ प्राप्त गर्दछ, प्रवासी नेपालीले पनि यहाँबाट
आफ्नै कमाइ पाइरहेका छन् । नेपालमा माओवादी युद्ध भइरहेका वेला दिल्लीमा मात्र ६
लाख नेपाली युवा रोजगारीका लागि आएका छन् भन्ने सुनिएको थियो । अहिले सो संख्या कति
छ भन्न सक्दिनँ । भारतभरि कहिलेकाहीँ करिब एक करोड नेपाली रोजगारीका लागि आउँछन्
भन्ने पनि सुनिएको हो । तीन करोड जनसंख्यामा एक करोडको कुरा ज्यादै ठूलो संख्या
मान्नुपर्छ । यस्तो अवस्थामा जनता सँगसँगै हाम्रो पार्टी पनि आउने नै भयो । जहाँ
जनता त्यहाँ पार्टी भएपछि यसलाई अन्यथा लिनु भएन । जुन देशमा हामी बस्छाँै त्यहाँको
कानुन पालनामा एकदमै सचेत हुनुपर्छ । खासगरी हाम्रा प्रवासी कमरेडहरूले तीनवटा
क्षेत्रमा ध्यान दिनुपर्छ र काम पनि ती क्षेत्रमै केन्दि्रत गर्नुपर्छ । तीमध्ये
एउटा क्षेत्र हो भारत प्रवासमा रहेका सबै नेपालीको हकहितको रक्षा गर्ने, अर्को हो-
भारतीय श्रमजीवी जनतासँग घनिष्ट सम्बन्ध बनाउने र तेस्रो- नेपालमा सञ्चालन गरिने
आन्दोलन परिवर्तन विकास र निर्माणमा सहभागिता समर्थन र ऐक्यबद्धता जनाउने
।
भारतमा नेपाली जनता कलकारखानामा कष्टकर मजदुरी गर्ने, अपमानित भएर पनि घरेलु
कामदार हुने र कुल्ली दरवान र चौकीदार भएर काम गर्ने गर्छन् । एउटा नेपाली हिस्सा
भारतीय सेनामा पनि कार्यरत छ । अहिले आएर नेपालीको एउटा ज्यादै सानो हिस्सा
उद्योग-धन्दा र बन्द-व्यापारमा पनि लागेका छन् । यसको संख्या नगन्य नै रहेको छ । के
तपाइर्ंहरूले योजनाबद्ध रूपमा यी समुदायबीच कहिल्यै काम गर्नुभएको छ ? अहँ
गर्नुभएको छैन । तपाइर्ंहरू कमिटीमा पार्टीकेन्द्रका यस्ता र उस्ताबाहेक अरू छलफल
नै गर्नुहुन्न किन ? किनकि तपाईहरूले यहाँका नेपाली श्रमिकको ठोस समस्यालाई हल
गर्ने संगठित प्रयत्न कहिल्यै गर्नुभएको छैन । कामै नगरेपछि कसरी संगठन विस्तार हुन
सक्छ ? यस्तो अवस्थामा भएको पनि बिगँ्रदै जानेछ ।
अर्को कामको क्षेत्र हो,
भारतीय जनतासँग सु-सम्बन्ध विस्तार गर्ने । भारतका जनता र शासकसँगको सम्बन्धलाई
सगोलमा हेर्नुहुन्न । भारत औपचारिक लोकतान्त्रिक मुलुक हो । लोकतन्त्रका उदार
सिद्धान्त पनि यहाँ क्रियाशील छन् । औपचारिक लोकतन्त्रका घीनलाग्दा उदाहरण पनि यहाँ
पाउन सकिन्छ । तर, श्रमिकलाई संगठित गर्न र संगठित रूपमा आफ्ना अधिकारको एक हदसम्म
संुरक्षण गर्न तिनै उदार पक्षलाई प्रयोग गर्न सकिन्छ । भारत औद्योगिक मुलुक पनि
भएकाले ठूलो संख्यामा श्रमिकको उपस्थिति छ । सबै व्यवसाय र वर्ग तथा तहका जनता यहाँ
संगठित छन् । हामीले यिनै श्रमिक संगठन, यी संगठनका पक्षधर राजनीतिक पार्टी र अन्य
सामाजिक संघसंस्थामार्फत पनि आफ्नो सम्बन्ध सुदृढ गर्ने कोसिस गर्नुपर्छ । हामीले
अन्तर्राष्ट्रिय श्रमिक संगठनसँग पनि सम्बन्ध कायम गर्नुपर्छ । सबै संस्थासँग
सम्बन्ध कायम गरेर नेपाली श्रमिकको हक-हितको संरक्षण गर्न लागिपर्नुपर्छ
।
भारतीय जनतालाई नेपाली जनता राष्ट्रवादी किन छन् भन्नेबारे जानकारी दिन पनि
जरुरी छ । हामी आधुनिक संसारमा कहिल्यै पनि कुनै पनि उपनिवेशका दास भएनौँ । हाम्रो
देश इतिहासको कुनै पनि कालखण्डमा कसैको उपनिवेश भएन । हाम्रो स्वाभिमान उच्च छ ।
पुराना सन्धि-सम्झौताले पनि हामीलाई -यता उताका श्रमिकलाई) रोजगारीको खोजीमा भारत
आउन प्रेरित गरेको हो । तिनै आधारमा भारतबाट पनि नेपालमा लाखाँै व्यक्ति अनेक
व्यवसायमा संलग्न हुन जाने/आउने गर्छन् । राजनीतिक पार्टीसँग पनि हामीले आफ्ना
विचारका बारेमा चर्चा गर्नुपर्छ र हाम्रो स्वतन्त्रता, अखण्डता र सार्वभौमिकताप्रति
हाम्रो अगाध प्रेम र समर्पण छ भनेर जानकारी गराउनुपर्छ । यसो गरेर हामीले सबै
किसिमको सहयोगका लागि मित्र तयार गर्न सक्छौँ । सबै हाम्रा मित्र बन्न तयार
नहोलान्, तर हामीजस्तै संघसंस्था हाम्रा मित्र बन्नेछन् । यस दिशामा हामीले खासै
प्रयत्न गरेजस्तो लाग्दैन । मेरो विचारमा अब हामीले यतातिर पनि काम गर्न ध्यान
दिनैपर्छ । प्रवासी नेपालीबाहेक भारतीय नेपालीको पनि यहाँ ठूलो संख्या छ र भारतीय
नेपाली नेपाली भाषा, साहित्य, कला र संस्कृतिको संरक्षण र सम्बर्धन गर्न क्रियाशील
छन् । उनीहरूसँग पनि सम्बन्ध विकास गर्ने र प्रवासी नेपालीका हक-हितका पक्षमा आवाज
उठाउन प्रेरित गर्नुपर्छ । यो पनि महत्त्वपूर्ण काम हुनेछ ।
प्रवासी नेपालीका
तर्फबाट गरिने योगदानको तेस्रो क्षेत्र हो नेपालमा सञ्चालित जनताको आन्दोलन, त्यसको
निर्माण र विकासप्रति ऐक्यबद्धता, सहयोग र समर्थन । भारत प्रवासमा रहेर नेपालीले
ज्यादै ठुल्ठूला योगदान गरेका छन् । सन् १९४९ मा कमरेड पुष्पलालले नेपाल कम्युनिस्ट
पार्टी गठन गर्दा कोलकाताका प्रवासी नेपालीले ठूलो योगदान गरेका थिए । तत्कालीन
राणाशाही शासन रहेका बखत भारत प्रवासमा कम्युनिस्ट पार्टी मात्र होइन, पँुजीवादी
पार्टी नेपाली कांग्रेस पनि जन्मेको हो । त्यसवेला अंग्रेजको उपनिवेशबाट भारत
स्वतन्त्र भएको थियो । त्यो परिस्थितिलाई उपयोग गरेर नेपालका राजनीतिक पार्टीले
भारतमा आश्रय लिएका थिए र उनीहरूको सहयोगमा ती पार्टीका कतिपय कामलाई व्यवस्थित पनि
गरिएको थियो ।
२००७ सालको अधुरो क्रान्तिमा पनि भारतस्थित प्रवासी नेपालीले
उल्लेखनीय भूमिका खेलेका थिए । ०१७ सालपछि निरंकुश राजतन्त्रात्मक पञ्चायती
शासनकालमा पनि निर्वासित राजनीतिक पार्टीका नेता-कार्यकर्तालाई आश्रय दिने र सहयोग
गर्ने काममा यहाँका प्रवासी नेपालीको ठूलै योगदान रह्यो । प्रवासी नेपालीले संगठित
रूपमा योगदान भने ०२५ सालदेखि कमरेड एकदेव आलेको नेतृत्वमा प्रवासी नेपाली
कल्याणकारिणी समिति निर्माण भएपछि सुरु भएको हो । त्यसयताका सबै नेपाली जनताका
संघर्षमा कुनै न कुनै हिसाबले प्रवासी नेपालीको संलग्नता रहेको छ । ०४७ सालपछि त आम
निर्वाचनमा पार्टीका उम्मेदवारलाई जिताउने उद्देश्य राखेर नेपाल जाने काम पवित्र
तीर्थयात्राजस्तै भयो । ०६२/६३ को ऐतिहासिक संयुक्त जनआन्दोलन सफल बनाउन प्रवासी
नेपालीको उल्लेख्य भूमिका रह्यो । त्यही आन्दोलनको पृष्ठभूमिमा नेपालमा दुई सय ४०
वर्षको शाहवंशीय राजतन्त्र उन्मूलन पनि भएको हो ।
अहिले हाम्रो देशमा
उथल-पुथलपूर्ण राजनीतिक घटनात्र mमबीच संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रको संक्रमणकाल
गुजँ्रदै छ । राजतन्त्र अन्त्य भए पनि सामन्तवाद, दलाल नोकरशाही पुँजीवाद र वैदेशिक
हस्तक्षेप र शोषण अन्त्य भएको छैन । धेरै उज्ज्वल सम्भावना र कठिन चुनौतीका बीच
हाम्रो देश अगाडि बढ्दै छ । राजतन्त्रको अन्त्यसँगै हाम्रो समाज शान्तिपूर्ण
जनक्रान्तिको चरणमा प्रवेश गरेको छ । बुद्धिमतापूर्ण ढंगबाट अगाडि बढ्न सकियो भने
शान्तिपूर्ण रूपमा जनवादी क्रान्ति सम्पन्न गरी हाम्रो देश जनताको बहुदलीय जनवादको
उज्ज्वल भविष्यमा प्रवेश गर्ने पक्का छ । अहिले हाम्रो समाजकै सबभन्दा प्रमुख काम
आगामी पाँच महिनाभित्र नयाँ संविधान जारी गर्ने र माओवादी सेनाको टुंगो लगाएर दिगो
शान्ति प्राप्त गर्ने हो । हाम्रो पार्टीले पाँच कार्यभार अगाडि सारेको छ । तर,
केन्द्रीय कार्यभार भने नयाँ संविधान जारी गर्ने र शान्तिप्रक्रियाको टुंगो लगाउने
कुरा नै हो । त्यसो भएर भारत प्रवासमा रहेका सम्पूर्ण कमरेडले यही केन्द्रीय
कार्यभार पूरा गर्न आफ्नोतर्फबाट सक्दो योगदान गर्नुपर्छ । यो कार्यभार पूरा गर्न
पनि नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलनमा देखा परेका उग्रवामपन्थी अराजकतावाद र दक्षिणपन्थी
यथास्थितिवादका विरुद्ध संघर्ष तेज गर्न जरुरी छ । यसो गर्दै शान्तिपूर्ण
जनक्रान्ति सम्पन्न गर्न महत्त्वपूर्ण योगदान गर्न आह्वान पनि गर्दछु ।
Saturday, December 18, 2010
युवा पीड़ी
अगर मैं अपनी उम्र की युवा पीड़ी को उद्दहरण के तोर पर लेकर आगे बड़ों तो बचपन मैं
दादा-दादियों द्वारा हमको अच्छी अच्छी से कहानियाँ सुनने को मिलती थी. कहते है कि
जब बच्चा छोटा होता है तो उस समय उसका मस्तिष्क बिल्कुल शून्य होता है, आप उसको
जैसे संस्कार और शिक्षा देंगे वो उसी राह पर आगे बढता है. अगर बाल्यकाल में बच्चे
को ये शिक्षा दी जाती है कि बेटा चोरी करना बुरा काम है तो वो चोरी करने से पहले सो
बार सोचेगा, क्योंकि उसको शिक्षा मिली हुई है कि चोरी करना बुरी बात है. बाल्यकाल
में बच्चे को संस्कारित करने में घर के बुजुर्गों का, माता पिता का बहुत बड़ा हाथ
होता है. जैसे मैंने कहा कि जब छोटे थे और गाँव के बुजुर्ग दादा-दादियों की संगत
में कुछ पल ब्यतीत करते थे, तो वो हमको बहुत कुछ अच्छी अच्छी कहानियाँ सुनाया करते
थे जिसका कुछ न कुछ प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क पर पड़ता था, उनमे से कुछ कहानिया
प्रेरणादायी होती थी, कुछ परोपकारी होती थी, कुछ जीवों पर दया करने वाली होती थी,
कुछ देवी देवितोँ की होती थी और कुछ क्षेत्रीय कहानिया होती थी और सबका उद्देश्य
हमारे अन्दर अच्छे संस्कारों को डालने का होता था और जो कि हमें संस्कारित बनाए
रखने में आज भी बहुत मदद करते है. आज भी यदि हमारे कदम अपने पथ से विचलित होने का
प्रयास करते है तो वो पुरानी कही हुई बातें याद आज जाती है और जो हमें फ़िर से सही
पथ पर ले जाने का प्रयास करती है.
मैंने किसी प्रत्रिका मैं पढ़ा था कि किसी
५ साल के बच्चे से किसी सम्मानीय ब्यक्ति ने दुर्गा माँ की फोटो की ओर इशारा करते
हुए पूछा बेटा ये कोन है तो बच्चे का जवाब था लोयन वाली औरत, जो इस लोयन के ऊपर
बैठी है, किसी दूसरे सम्मानीय ब्यक्ति ने गणेश भगवान् के बारे में पूछा तो बच्चा
गणेश जी को...Elephant God.......संबोधित करते हुए पाया गया. अब बताओ इसमे उस बच्चे
का कसूर ही क्या है? जब कभी भी उस परिवार के सदस्य ने उसको ये बताने की कोशिश नही
की कि बेटा ये दुर्गा माता है जिनका वहां शेर है या ये गणेश भगवान् जी है जिनका मुह
हाथी की सूंड जैसा होता है तो उसको कैसे पता चलता?
जब हम छोटे थे तो हमारे
पास एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी जिनमे कि बहुत अच्छी अच्छी कहानिया होती थी
जिनको पड़कर बहुत आनंद आता था और एक बार मन में उन जैसा बनने की तीव्र इच्छा होती
थी, लेकिन शायद आजकल उस नैतिक शिक्षा की किताब का अर्थ ही बदल गया है, उसका कोई
महत्व ही नही रह गया है. मुझे तो लग रहा है कि शायद आज वो नैतिक शिक्षा की किताब
स्कूलों से गायब भी हो चुकी होगी.
आज आपके घरों में दुनिया भर की कोमिक्स का
ढेर मिल जाएगा, कंप्यूटर गेम्स की दुनिया भर की सी डी मिल जाएँगी, फिल्मी गानों की
दुनिया भर की कैसेट आपके बच्चे के कमरे में मिल जायेगी लेकिन सरदार भगत सिंह,
महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद आदि मनीषियों की प्रेरणा श्रोत कहानियो की किताब
आपके बच्चे के स्कूल बैग से नदारद मिलेगी और यहाँ तक कि आप भी ये कोशिश कभी नही
करेंगे कि आप अपने बच्चे को ऐसी किताबें खरीद कर लायें. पहले यदि हमारे माँ बाप ऐसी
किताबें नही भी खरीदा करते थे तो इसकी कमी हमारे दादा-दादी और बुजुर्ग पूरा कर देते
थे, लेकिन आज हमारे बुरुगों की क्या स्तिथि है ये हम सब लोग जानते है. आज हर माँ
बाप की ये कोशिश रहती है कि उनके बच्चे उनके दादा-दादी से दूर रहे, यदि कभी दादा
दादी ने बच्चे को डांटने की हिमाकत भी कर ली तो उल्टा उनको उसकी कीमत भी चुकानी
पड़ती है.
शायद ही अब किसी बच्चे को वो दादा दादी की कहानिया सुनने को मिलती
होंगी, वो लोरी वो गीत सुनने को मिलते होंगे और शायद न ही कोई माँ बाप के पास इतना
समय है कि वो अपने बच्चे को संस्कारित होने के संस्कार दे सकें. आज महात्मा गांधी,
भगत सिंह, विवेकनन्द, लाल बहादुर शास्त्री केवल या तो उनके जन्म दिवस के मोके पर ही
याद किए जाते है या उनके निर्वाण दिवस पर, आज वो हमारे घरों से नदारद है, हमारे
दादा-दादियों की कहानियो से नदारद है, हमारे माँ बाप की जुबान से बहुत दूर है,
हमारे आस से दूर है और हमारे पड़ोस से दूर है. तो कैसे हम ये आशा कर सकते है कि
हमारे बच्चों से अच्छे संस्कार आयें? अच्छे संस्कार देने के लिए हमारे पास तो समय
नही है, जो उनको अच्छे संस्कार दे सकते थे उनको तो उपेक्षित किया जाता है, जिन
पुस्तकों को पढने से उनको संस्कारित किया जा सकता है उनका स्थान कोमिक्स, खिलोने और
कोम्प्टर गेम्स ने ले लिया है, तो कैसे हम ये आश कर सकते है.
इसके बारे में
हमको ख़ुद सोचना चाहिए क्योंकि कल हमें भी किसी का माँ / बाप और दादा/दादी बनना है.
हम ये निश्चय करते है कि हमारी संतान किस दिशा में जा रही है और हम उनको क्या
संस्कार दे रहे है. इसका और कोई जिम्मेदार नही है, केवल हम ही है.
दादा-दादियों द्वारा हमको अच्छी अच्छी से कहानियाँ सुनने को मिलती थी. कहते है कि
जब बच्चा छोटा होता है तो उस समय उसका मस्तिष्क बिल्कुल शून्य होता है, आप उसको
जैसे संस्कार और शिक्षा देंगे वो उसी राह पर आगे बढता है. अगर बाल्यकाल में बच्चे
को ये शिक्षा दी जाती है कि बेटा चोरी करना बुरा काम है तो वो चोरी करने से पहले सो
बार सोचेगा, क्योंकि उसको शिक्षा मिली हुई है कि चोरी करना बुरी बात है. बाल्यकाल
में बच्चे को संस्कारित करने में घर के बुजुर्गों का, माता पिता का बहुत बड़ा हाथ
होता है. जैसे मैंने कहा कि जब छोटे थे और गाँव के बुजुर्ग दादा-दादियों की संगत
में कुछ पल ब्यतीत करते थे, तो वो हमको बहुत कुछ अच्छी अच्छी कहानियाँ सुनाया करते
थे जिसका कुछ न कुछ प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क पर पड़ता था, उनमे से कुछ कहानिया
प्रेरणादायी होती थी, कुछ परोपकारी होती थी, कुछ जीवों पर दया करने वाली होती थी,
कुछ देवी देवितोँ की होती थी और कुछ क्षेत्रीय कहानिया होती थी और सबका उद्देश्य
हमारे अन्दर अच्छे संस्कारों को डालने का होता था और जो कि हमें संस्कारित बनाए
रखने में आज भी बहुत मदद करते है. आज भी यदि हमारे कदम अपने पथ से विचलित होने का
प्रयास करते है तो वो पुरानी कही हुई बातें याद आज जाती है और जो हमें फ़िर से सही
पथ पर ले जाने का प्रयास करती है.
मैंने किसी प्रत्रिका मैं पढ़ा था कि किसी
५ साल के बच्चे से किसी सम्मानीय ब्यक्ति ने दुर्गा माँ की फोटो की ओर इशारा करते
हुए पूछा बेटा ये कोन है तो बच्चे का जवाब था लोयन वाली औरत, जो इस लोयन के ऊपर
बैठी है, किसी दूसरे सम्मानीय ब्यक्ति ने गणेश भगवान् के बारे में पूछा तो बच्चा
गणेश जी को...Elephant God.......संबोधित करते हुए पाया गया. अब बताओ इसमे उस बच्चे
का कसूर ही क्या है? जब कभी भी उस परिवार के सदस्य ने उसको ये बताने की कोशिश नही
की कि बेटा ये दुर्गा माता है जिनका वहां शेर है या ये गणेश भगवान् जी है जिनका मुह
हाथी की सूंड जैसा होता है तो उसको कैसे पता चलता?
जब हम छोटे थे तो हमारे
पास एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी जिनमे कि बहुत अच्छी अच्छी कहानिया होती थी
जिनको पड़कर बहुत आनंद आता था और एक बार मन में उन जैसा बनने की तीव्र इच्छा होती
थी, लेकिन शायद आजकल उस नैतिक शिक्षा की किताब का अर्थ ही बदल गया है, उसका कोई
महत्व ही नही रह गया है. मुझे तो लग रहा है कि शायद आज वो नैतिक शिक्षा की किताब
स्कूलों से गायब भी हो चुकी होगी.
आज आपके घरों में दुनिया भर की कोमिक्स का
ढेर मिल जाएगा, कंप्यूटर गेम्स की दुनिया भर की सी डी मिल जाएँगी, फिल्मी गानों की
दुनिया भर की कैसेट आपके बच्चे के कमरे में मिल जायेगी लेकिन सरदार भगत सिंह,
महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद आदि मनीषियों की प्रेरणा श्रोत कहानियो की किताब
आपके बच्चे के स्कूल बैग से नदारद मिलेगी और यहाँ तक कि आप भी ये कोशिश कभी नही
करेंगे कि आप अपने बच्चे को ऐसी किताबें खरीद कर लायें. पहले यदि हमारे माँ बाप ऐसी
किताबें नही भी खरीदा करते थे तो इसकी कमी हमारे दादा-दादी और बुजुर्ग पूरा कर देते
थे, लेकिन आज हमारे बुरुगों की क्या स्तिथि है ये हम सब लोग जानते है. आज हर माँ
बाप की ये कोशिश रहती है कि उनके बच्चे उनके दादा-दादी से दूर रहे, यदि कभी दादा
दादी ने बच्चे को डांटने की हिमाकत भी कर ली तो उल्टा उनको उसकी कीमत भी चुकानी
पड़ती है.
शायद ही अब किसी बच्चे को वो दादा दादी की कहानिया सुनने को मिलती
होंगी, वो लोरी वो गीत सुनने को मिलते होंगे और शायद न ही कोई माँ बाप के पास इतना
समय है कि वो अपने बच्चे को संस्कारित होने के संस्कार दे सकें. आज महात्मा गांधी,
भगत सिंह, विवेकनन्द, लाल बहादुर शास्त्री केवल या तो उनके जन्म दिवस के मोके पर ही
याद किए जाते है या उनके निर्वाण दिवस पर, आज वो हमारे घरों से नदारद है, हमारे
दादा-दादियों की कहानियो से नदारद है, हमारे माँ बाप की जुबान से बहुत दूर है,
हमारे आस से दूर है और हमारे पड़ोस से दूर है. तो कैसे हम ये आशा कर सकते है कि
हमारे बच्चों से अच्छे संस्कार आयें? अच्छे संस्कार देने के लिए हमारे पास तो समय
नही है, जो उनको अच्छे संस्कार दे सकते थे उनको तो उपेक्षित किया जाता है, जिन
पुस्तकों को पढने से उनको संस्कारित किया जा सकता है उनका स्थान कोमिक्स, खिलोने और
कोम्प्टर गेम्स ने ले लिया है, तो कैसे हम ये आश कर सकते है.
इसके बारे में
हमको ख़ुद सोचना चाहिए क्योंकि कल हमें भी किसी का माँ / बाप और दादा/दादी बनना है.
हम ये निश्चय करते है कि हमारी संतान किस दिशा में जा रही है और हम उनको क्या
संस्कार दे रहे है. इसका और कोई जिम्मेदार नही है, केवल हम ही है.
Thursday, December 16, 2010
मराठी लादेन और भाड़े के टट्टू
अगर आज ओसामा बिन लादेन का नाम कही पर याद किया जाता है तो आतंकवाद शब्द अपने आप अपने आप वहा पर जुड़ जाता है. हम सबको पता है कि आतंकवाद और ओसामा बिन लादेन का चोली दामन का साथ है, बिना आतंकवाद के न तो लादेन को याद किया जाएगा और न लादेन के बिना आतंकवाद. पूरा विश्वास लादेन के केवल नाम लेने से ही काँप जाता है. चलो छोडो मैं आज विश्वब्यापी लादेन की बात नही करता हूँ, मैं एक भारतवासी हूँ तो आज भारत के लादेन की बात करता हूँ.
आज सबसे पहले शुरुआत करूँगा मराठी लादेन और उसके भाड़े के टटौं की. आप लोग मेरा इशारा समझ ही गए होंगे, मैं किस उभरते लादेन की बात कर रहा हूँ, हाँ दोस्तों आपने ठीक पहिचाना मैं बात कर रहा हूँ महाराष्ट्र के उभरते हुए लादेन मान्यवर श्री राज ठाकरे जी का. आप लोग थोड़ा सा संकित हो रहे होंगे कि मैं राज ठाकरे जी को लादेन की उप संज्ञा के साथ साथ मान्यवर शब्द का भी प्रयोग कर रहा हूँ, वो इसलिए कि लादेन के साथ साथ वो एक राजनेता भी है और राजनेता का थोड़ा बहुत मान सम्मान भी तो होना चाहिए.
विस्तार में न जाकर मैं सीधे अपने मुख्या विन्दु पर आना चाहता हूँ. मराठी लादेन जी आज हमारा देश, हमारी जनता लोगों को जोड़ने की बात करती है, आपसी भाई चारा बढाने पर जोर दे रही है, विश्व बंधुत्व और वासुदेव कुटुम्बकम की जीवन शैली अपनाने पर जोर दे रही है और आप हमारे इस भाई चारे को तोड़ना चाहते हो? आप हो कोन? किस अधिकार से आप जाति वाद, भाषा वाद के आधार पर हमारे समाज को बाटना चाहते हो? किस आधार पर आप मासूम और निर्दोष लोगों का खून बहा रहे हो ? पहले आप अपना परिचय तो बताईये? आप हो कोन ? क्या आप एक राजनेता हो? अगर हाँ तो क्या आपको राजनेता की परिभाषा आती है? क्या आप एक समाज सुधारक हो? अगर हाँ तो क्या आपको समाज और सुधारक शब्द का अर्थ पता है? क्या आप आप एक सच्चे मराठी हो? यदि हाँ तो क्या आपको मराठी शब्द और इसका इतिहास मालूम है? नही राज ठाकरे जी आप में इनमे से न किसी का अर्थ जानते है और न इनमे से कोई भी गुण आप में विद्यमान है, तो आप हो कोन? अब मेरे पास केवल एक ही उत्तर है वो है आतंकवादी, सफ़ेद पोश आतंकवादी.
मुझे तो तरश आ रहा है अपने इस हिन्दुस्तान पर. हमारा ये हिन्दुस्तान किन किन आतंकवादियों से लडेगा. किन किन का सामना करेगा. विदेशी आतंकवादियों के हम हमेशा से ही निशाने पर रहे है लेकिन अब तो हमें स्वदेशी आतंकवादियों से भी जूझना पड़ रहा है, जो कि अपने ही लोगों के खून के प्यासे बने हुए है. कोई धर्म की आड़ में आतंकवाद फैला रहा तो कोई राजनीति की आड़ में आतंकवाद.
राजठाकरे जी आप कहते हो कि आपको अपने महाराष्ट्र की बहुत चिंता है, यहाँ के लोगों की बहुत चिंता है, लेकिन क्या आपने कभी अपने उन लोगों से जाकर पूछा कि वो क्या चाहते है, जो आप उनके नाम पर गुंडा गर्दी कर रहे है , क्या वो इससे खुश है कि नही? क्या आपको अपनी राजनीति करने का बस यही रास्ता मिला? अरे जरा बाहर सड़कों पर पैदल निकल देखिये, किसी गरीब की झोपडी में जाकर देखिये, किसी बुजुर्ग दम्पति के पास २ मिनट का समय ब्यतीत कर देखिये, किसी विकलांग का हाथ पकड़ कर देखिये, किसी बीमार ब्यक्ति से उसका हाल चाल पूछकर देखिये, तब आपको पता चलेगा की आपका मराठा प्रेम कितना सच्चा और कितना झूठा है. अरे आलिशान महलों सोने वाले और चांदी के बर्तनों में खाने वाले भला कैसे जानेंगे कि फुटपाथ पर सोना कितना कष्टदायी होता है.
राज ठाकरे जी की पार्टी /सेना जिसका नाम शायद कुछ इस प्रकार से है "नव निर्माण", शायद कुछ इसी प्रकार से है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि पार्टी/सेना कुछ निर्माण कार्य न करने के बजाय विनाश का काम कर रही है. देश को तोड़ने का काम, भाई चारा तोड़ने का काम, समाज को बाटने का काम. इस पार्टी /सेना पर तो ये सूक्ति भी ठीक से लागू नही होती "जतो नाम तथो गुण:" . अफ़सोस होता है ऐसे कर्याकर्तों को देखकर जो बिना सोचे समझे किसी के बहकावे में आकर कुछ भी कर जाते है. मैं इनको एक सच्चा कार्यकर्ता न कह कर भाड़े का टट्टू ही कहूँगा, क्योंकि एक सामाजिक कार्य करता वो होता है जो अपनी बुधि और विवेक के बल पर किसी कार्य को प्रोत्साहित और कार्यन्वित करता है. मैं इन भाड़े के टटौं से पूछना चाहता हूँ कि क्या कभी ख़ुद राज ठाकरे आप लोगों के साथ किसी हिंसक गतिविधि में शामिल हुए? क्या कभी उन्होंने किसी गैर मराठी को ख़ुद पत्थर और तमांचे मारे, किसी कि टैक्सी के शीशे तोडे, किसी की झुग्गी झोपडी थोडी, उत्तर है नही क्योंकि उसके पास १००-२०० रूपये में बिकने वाले भाडू के टट्टू बहुत आसानी से मिल जाते है. क्षमा करना दोस्तों भाषा कुछ अशिष्ट लग रही है, लेकिन अपने दिल के उदगार को ब्यक्त करने के लिए इन शब्दों का प्रयोग बहुत जरूरी है.
यदि मेरे ये शब्द मराठी लादेन और उसके भाड़े के टटौं तक पहुच रही है तो मेरी उनसे विनर्म प्रार्थना है कि बंद करो अपनी ये गुंडा गर्दी, देश और समाज को बाटने की गन्दी राजनीति, बंद करो भाषा और जाति धर्म के नाम पर हिंसा. क्योंकि हिन्दुस्तान एक प्रजातंत्र राष्ट है और यहाँ हर किसी को भारतीय सविधान के अनुसार जीने और बोलने का अधिकार है. देश से बड़ा कोई धर्म नही है, पहले हम हिन्दुस्तानी है और फ़िर मराठी, गुजराती, पंजाबी, पहाडी....और गैर मराठी.
मिस्टर लादेन जी दिल में तो बहुत कुछ है कहने के लिए लेकिन समय की कमी है. मैं न तो कोई राजनेता हूँ, न कोई समाज सुधारक और न कोई विद्वान कवि-लेखक. लेकिन चलते चलते आपको एक नसीहत जरूर देना चाहता हूँ यदि आपको सच में एक अच्छा राजनेता बनना है, समाज की सेवा करनी है तो महात्मा गाँधी, स्वामी विवेकानंद, सरदार बल्लभ भाई पटेल आदि ऐतिहासिक पुरुषों को अपना आदर्श बनाईये न कि ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी को.
चलते चलते इन दो पंक्तियों के साथ आपके, आपकी नव निर्माण सेना और सम्पूर्ण भारतवाशियों की शुभ मंगल कामना करता हूँ.
आज सबसे पहले शुरुआत करूँगा मराठी लादेन और उसके भाड़े के टटौं की. आप लोग मेरा इशारा समझ ही गए होंगे, मैं किस उभरते लादेन की बात कर रहा हूँ, हाँ दोस्तों आपने ठीक पहिचाना मैं बात कर रहा हूँ महाराष्ट्र के उभरते हुए लादेन मान्यवर श्री राज ठाकरे जी का. आप लोग थोड़ा सा संकित हो रहे होंगे कि मैं राज ठाकरे जी को लादेन की उप संज्ञा के साथ साथ मान्यवर शब्द का भी प्रयोग कर रहा हूँ, वो इसलिए कि लादेन के साथ साथ वो एक राजनेता भी है और राजनेता का थोड़ा बहुत मान सम्मान भी तो होना चाहिए.
विस्तार में न जाकर मैं सीधे अपने मुख्या विन्दु पर आना चाहता हूँ. मराठी लादेन जी आज हमारा देश, हमारी जनता लोगों को जोड़ने की बात करती है, आपसी भाई चारा बढाने पर जोर दे रही है, विश्व बंधुत्व और वासुदेव कुटुम्बकम की जीवन शैली अपनाने पर जोर दे रही है और आप हमारे इस भाई चारे को तोड़ना चाहते हो? आप हो कोन? किस अधिकार से आप जाति वाद, भाषा वाद के आधार पर हमारे समाज को बाटना चाहते हो? किस आधार पर आप मासूम और निर्दोष लोगों का खून बहा रहे हो ? पहले आप अपना परिचय तो बताईये? आप हो कोन ? क्या आप एक राजनेता हो? अगर हाँ तो क्या आपको राजनेता की परिभाषा आती है? क्या आप एक समाज सुधारक हो? अगर हाँ तो क्या आपको समाज और सुधारक शब्द का अर्थ पता है? क्या आप आप एक सच्चे मराठी हो? यदि हाँ तो क्या आपको मराठी शब्द और इसका इतिहास मालूम है? नही राज ठाकरे जी आप में इनमे से न किसी का अर्थ जानते है और न इनमे से कोई भी गुण आप में विद्यमान है, तो आप हो कोन? अब मेरे पास केवल एक ही उत्तर है वो है आतंकवादी, सफ़ेद पोश आतंकवादी.
मुझे तो तरश आ रहा है अपने इस हिन्दुस्तान पर. हमारा ये हिन्दुस्तान किन किन आतंकवादियों से लडेगा. किन किन का सामना करेगा. विदेशी आतंकवादियों के हम हमेशा से ही निशाने पर रहे है लेकिन अब तो हमें स्वदेशी आतंकवादियों से भी जूझना पड़ रहा है, जो कि अपने ही लोगों के खून के प्यासे बने हुए है. कोई धर्म की आड़ में आतंकवाद फैला रहा तो कोई राजनीति की आड़ में आतंकवाद.
राजठाकरे जी आप कहते हो कि आपको अपने महाराष्ट्र की बहुत चिंता है, यहाँ के लोगों की बहुत चिंता है, लेकिन क्या आपने कभी अपने उन लोगों से जाकर पूछा कि वो क्या चाहते है, जो आप उनके नाम पर गुंडा गर्दी कर रहे है , क्या वो इससे खुश है कि नही? क्या आपको अपनी राजनीति करने का बस यही रास्ता मिला? अरे जरा बाहर सड़कों पर पैदल निकल देखिये, किसी गरीब की झोपडी में जाकर देखिये, किसी बुजुर्ग दम्पति के पास २ मिनट का समय ब्यतीत कर देखिये, किसी विकलांग का हाथ पकड़ कर देखिये, किसी बीमार ब्यक्ति से उसका हाल चाल पूछकर देखिये, तब आपको पता चलेगा की आपका मराठा प्रेम कितना सच्चा और कितना झूठा है. अरे आलिशान महलों सोने वाले और चांदी के बर्तनों में खाने वाले भला कैसे जानेंगे कि फुटपाथ पर सोना कितना कष्टदायी होता है.
राज ठाकरे जी की पार्टी /सेना जिसका नाम शायद कुछ इस प्रकार से है "नव निर्माण", शायद कुछ इसी प्रकार से है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि पार्टी/सेना कुछ निर्माण कार्य न करने के बजाय विनाश का काम कर रही है. देश को तोड़ने का काम, भाई चारा तोड़ने का काम, समाज को बाटने का काम. इस पार्टी /सेना पर तो ये सूक्ति भी ठीक से लागू नही होती "जतो नाम तथो गुण:" . अफ़सोस होता है ऐसे कर्याकर्तों को देखकर जो बिना सोचे समझे किसी के बहकावे में आकर कुछ भी कर जाते है. मैं इनको एक सच्चा कार्यकर्ता न कह कर भाड़े का टट्टू ही कहूँगा, क्योंकि एक सामाजिक कार्य करता वो होता है जो अपनी बुधि और विवेक के बल पर किसी कार्य को प्रोत्साहित और कार्यन्वित करता है. मैं इन भाड़े के टटौं से पूछना चाहता हूँ कि क्या कभी ख़ुद राज ठाकरे आप लोगों के साथ किसी हिंसक गतिविधि में शामिल हुए? क्या कभी उन्होंने किसी गैर मराठी को ख़ुद पत्थर और तमांचे मारे, किसी कि टैक्सी के शीशे तोडे, किसी की झुग्गी झोपडी थोडी, उत्तर है नही क्योंकि उसके पास १००-२०० रूपये में बिकने वाले भाडू के टट्टू बहुत आसानी से मिल जाते है. क्षमा करना दोस्तों भाषा कुछ अशिष्ट लग रही है, लेकिन अपने दिल के उदगार को ब्यक्त करने के लिए इन शब्दों का प्रयोग बहुत जरूरी है.
यदि मेरे ये शब्द मराठी लादेन और उसके भाड़े के टटौं तक पहुच रही है तो मेरी उनसे विनर्म प्रार्थना है कि बंद करो अपनी ये गुंडा गर्दी, देश और समाज को बाटने की गन्दी राजनीति, बंद करो भाषा और जाति धर्म के नाम पर हिंसा. क्योंकि हिन्दुस्तान एक प्रजातंत्र राष्ट है और यहाँ हर किसी को भारतीय सविधान के अनुसार जीने और बोलने का अधिकार है. देश से बड़ा कोई धर्म नही है, पहले हम हिन्दुस्तानी है और फ़िर मराठी, गुजराती, पंजाबी, पहाडी....और गैर मराठी.
मिस्टर लादेन जी दिल में तो बहुत कुछ है कहने के लिए लेकिन समय की कमी है. मैं न तो कोई राजनेता हूँ, न कोई समाज सुधारक और न कोई विद्वान कवि-लेखक. लेकिन चलते चलते आपको एक नसीहत जरूर देना चाहता हूँ यदि आपको सच में एक अच्छा राजनेता बनना है, समाज की सेवा करनी है तो महात्मा गाँधी, स्वामी विवेकानंद, सरदार बल्लभ भाई पटेल आदि ऐतिहासिक पुरुषों को अपना आदर्श बनाईये न कि ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादी को.
चलते चलते इन दो पंक्तियों के साथ आपके, आपकी नव निर्माण सेना और सम्पूर्ण भारतवाशियों की शुभ मंगल कामना करता हूँ.
Tuesday, December 14, 2010
पब संस्कृति बनाम भारतीय संस्कृति
पिछले दिनों मंगलोर के एक पब पर कुछ हिंसावादियों द्वारा लड़कियों की पिटाई का मामला आज भारतीय राजनीती और मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है . वास्तव में जो कुछ भी हुआ,उसका तरीका बहुत ही निंदनीय है लेकिन इस घटना ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है "क्या पब संस्कृति भारतीय संस्कृति का अंग है या नही " और भारतीय संस्कृति के सरंक्षण के ठेकेदार कोन है?. सचमुच एक सोचनीय विषय है.
प्रत्येक जन की अपनी अलग अलग राय इस विषय पर देखने और सुनने को मिलती है. कोई इसका पक्षधर है तो किसी के मतानुसार पब संस्कृति बिल्कुल भी भारतीय संस्कृति का अंग नही है. अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न हम लोगों के बीच में उभर कर आया है कि आखिर भारतीय संस्कृति क्या है और इसके सरंक्षण के ठेकेदार कोन है?
आज भारतीय सविधान ने हर किसी को अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का अधिकार दिया हुआ है. सभी लोग कहते है कि ये मेरी लाइफ है जिसे मैं जैसे चाहों उस ढंग से जी सकता हूँ , लेकिन साथ साथ में सविधान ने ये भी कहा है कि आपकी स्वतंत्रा वहा पर ख़तम हो जाती है जहा पर उससे किसी दूसरे को परेशानी का अनुभव होता है. शायद इस विषय पर हमारा ध्यान नही जाता.
अब बात आती है कि क्या पब संस्कृति को भारतीय समाज में मान्यता मिलनी चाहिए या पब संस्कृति भारतीय सभ्यता के लिए हानिकारक है? मेरी ब्याक्तिगत राय में पब संस्कृति न कभी भारतीय संस्कृति का अंग रही होगी और न कभी इसको भारतीय संस्कृति में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए. हमारी अपनी संस्कृति अपने आप में अदुतीय है. विश्व में यदि कोई संस्कारित और पर हितकारी संस्कृति है तो वो है "भारतीय संस्कृति ". क्यों हम लोग अपनी संस्कृति को बिगाड़ने का काम कर रहे है?, क्यों हम लोग पश्चिमी संस्कृति में मिश्रित होना चाहते है. आज जो लोग २१वी सदी की दुहाई देते हुए कहते है लोग चाँद पर पहुच गए है और हम आज भी वही ४०-५० पहले वाली सोच पाले हुए है, बुजुर्गों की सोच पाले हुए है. ये राग आलापते हुए कि आज दुनिया विकास कर रही है, हम लोग विकास कर रहे है तो हमको अपनी सोच भी बदलनी चाहिए, हमें भी विकास करना चाहिए. मैं भी इस बात से इतेफाक रखता हूँ कि जरूर हमें भी विकास करना चाहिए किस क्षेत्र में- आर्थिक क्षेत्र में, बोधिक क्षेत्र में, तकनीकी के क्षेत्र में, हमें भी इतना विकास करना चाहिए कि कोई भी भूख से न मरे, प्यास से न मरे, तन ढकने के लिए सबको कपड़ा मिले. हमें ऐसा विकास चाहिए.
आर्थिक विकास और तकनीकी विकास की तो हम हमेशा बात करते रहते है लेकिन क्या कभी हमने सामाजिक विकास की बात की.क्या हमने कभी सोचा कि हमारा सामाजिक विकास किस प्रकार होना चाहिए. क्या आर्थिक दृष्टि से मजबूत होना ही विकास को परिभाषित करता है? क्या सामजिक मूल्यों का विकास में कोई योगदान नही है? जो लोग पब संस्कृति की बात कर रहे है मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि किसी भी पब में जाकर नृत्य करना, दारु नशा और विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करके उसमे झूमना, ये किस विकास की बात हो रही है और ये कोंसी सभ्यता है?
प्रत्येक जन की अपनी अलग अलग राय इस विषय पर देखने और सुनने को मिलती है. कोई इसका पक्षधर है तो किसी के मतानुसार पब संस्कृति बिल्कुल भी भारतीय संस्कृति का अंग नही है. अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न हम लोगों के बीच में उभर कर आया है कि आखिर भारतीय संस्कृति क्या है और इसके सरंक्षण के ठेकेदार कोन है?
आज भारतीय सविधान ने हर किसी को अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का अधिकार दिया हुआ है. सभी लोग कहते है कि ये मेरी लाइफ है जिसे मैं जैसे चाहों उस ढंग से जी सकता हूँ , लेकिन साथ साथ में सविधान ने ये भी कहा है कि आपकी स्वतंत्रा वहा पर ख़तम हो जाती है जहा पर उससे किसी दूसरे को परेशानी का अनुभव होता है. शायद इस विषय पर हमारा ध्यान नही जाता.
अब बात आती है कि क्या पब संस्कृति को भारतीय समाज में मान्यता मिलनी चाहिए या पब संस्कृति भारतीय सभ्यता के लिए हानिकारक है? मेरी ब्याक्तिगत राय में पब संस्कृति न कभी भारतीय संस्कृति का अंग रही होगी और न कभी इसको भारतीय संस्कृति में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए. हमारी अपनी संस्कृति अपने आप में अदुतीय है. विश्व में यदि कोई संस्कारित और पर हितकारी संस्कृति है तो वो है "भारतीय संस्कृति ". क्यों हम लोग अपनी संस्कृति को बिगाड़ने का काम कर रहे है?, क्यों हम लोग पश्चिमी संस्कृति में मिश्रित होना चाहते है. आज जो लोग २१वी सदी की दुहाई देते हुए कहते है लोग चाँद पर पहुच गए है और हम आज भी वही ४०-५० पहले वाली सोच पाले हुए है, बुजुर्गों की सोच पाले हुए है. ये राग आलापते हुए कि आज दुनिया विकास कर रही है, हम लोग विकास कर रहे है तो हमको अपनी सोच भी बदलनी चाहिए, हमें भी विकास करना चाहिए. मैं भी इस बात से इतेफाक रखता हूँ कि जरूर हमें भी विकास करना चाहिए किस क्षेत्र में- आर्थिक क्षेत्र में, बोधिक क्षेत्र में, तकनीकी के क्षेत्र में, हमें भी इतना विकास करना चाहिए कि कोई भी भूख से न मरे, प्यास से न मरे, तन ढकने के लिए सबको कपड़ा मिले. हमें ऐसा विकास चाहिए.
आर्थिक विकास और तकनीकी विकास की तो हम हमेशा बात करते रहते है लेकिन क्या कभी हमने सामाजिक विकास की बात की.क्या हमने कभी सोचा कि हमारा सामाजिक विकास किस प्रकार होना चाहिए. क्या आर्थिक दृष्टि से मजबूत होना ही विकास को परिभाषित करता है? क्या सामजिक मूल्यों का विकास में कोई योगदान नही है? जो लोग पब संस्कृति की बात कर रहे है मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूँ कि किसी भी पब में जाकर नृत्य करना, दारु नशा और विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करके उसमे झूमना, ये किस विकास की बात हो रही है और ये कोंसी सभ्यता है?
Sunday, December 12, 2010
नमस्कार, जैसे कि आप लोगों को मालूम ही होगा कि बिहार में कोसी नदी में बाड आ जाने से वहा का जीवन अस्त-ब्यस्त हो गया है, लोगों के घर पानी में डूब गए है, फसलें नष्ट हो गई है, कई लोग अपनी जिंदगी गँवा चुके है और कई लोग जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे है. आशियाने डूब गए है, एक चलती फिरती जिंदगी अचानक सी रुक सी गई है, बिहार के बाड प्रभावित लोग कई प्रकार की परेशानियों से झूझ रहे है. इंसानियत के नाते हम लोगों को भी आज इस संकट की घड़ी में उन बाड प्रभावित लोगों के साथ उनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए. यदि हम शारीरिक रूप से उनका साथ नही दे सकते है, तो आर्थिक रूप से हम उनकी कुछ न कुछ मदद जरूर कर सकते है. मेरा ब्याक्तिगत हम सभी लोगों से निवेदन है कि हमें भी इस प्राकृतिक आपदा में उन लोगों का साथ देना चाहिए. जिससे जितनी आर्थिक सहायता हो सकती है कृपया सभी लोग आगे आयें और इस मुश्किल की घड़ी में उन लोगों का हमसफर बनें.
बात कुछ दिन पहले की है. मैं सुबह घर से अपने ऑफिस के लिए निकलते हुए बस स्टैंड पर पंहुचा. स्टैंड पर काफी भीड़ थी, कई लोग बस से उतर रहे थे तो कई लोग बस में सवार हो रहे थे और कई लोग बस का इंतजार भी कर रहे थे, उन्ही में से एक मैं भी अपनी बस का इन्तजार कर रहा था. मुझे लगभग २-३ मिनट बस की इंतजारी करते हुए हो गया था, लेकिन मैं इन चंद मिनटों के समय में एक चीज ध्यान पूर्वक देख रहा था, एक बुजुर्ग, उम्र लगभग ६०-७० के बीच की, बस स्टैंड पर उपस्स्तिथ सभी लोगों से हाथ जोड़कर विनती कर रहे थे कि कोई उन्हें खाना खिलाये, उन्हें भूख लगी है, उनकी हालत देख कर तो ऐसा लग रहा था कि जैसे उन्होंने काफी समय से भोजन नही किया है, लेकिन किसी भी मुसाफिर ने उनकी तरफ़ देखना तक पसंद नही किया, वह बेचारा, लाचार, भूख प्यास से पीड़ित बुजुर्ग अभी भी इस आश से लोगों से विनती कर रहा था कि कोई जरूर उनकी मदद करेगा, लेकिन शायद दया नामक भावः हमारे ह्रदय में रहा ही न था. जैसे मैं उस बुजुर्ग की ओर आगे बड़ा तभी एक महानुभाव ने उनकी तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि चलो मैं आपको भोजन करवाता हूँ. वो सज्जन उन बुजुर्ग को एक रेडी वाले की दुकान पर ले गए और रेडी वाले से उनके लिए भोजन की थाली को लगाने के लिए कहा. मेरी नजर तो उन बुजुर्ग पर ही थी, मैं तब और भी अचंभित हो गया जब उस दुकानदार ने उस बुजुर्ग को खाना देने से साफ़ मना कर दिया. मेरी समझ में ये नही आ रहा था कि जब वो सज्जन उनको खाना खिलाना चाहता है तो फ़िर वो मना क्यों कर रहा है? उस सज्जन ने बड़े प्रेम से उस रेडी वाले से कहा कि भय्या मैं तुमको पैसे दे रहा हूँ, तुम्हे इनको भोजन खिलाने में क्या परेशानी है? तब रेडी वाला बोलता है कि ये बुड्डा पागल है, ये बार बार यहाँ पर आकर खाना मांगता है, मैं इसको खाना नही दूंगा. उस सज्जन की काफी अनुनय विनय के बाद वो दुकानदार उस बुजुर्ग को खाना देने के लिए तैयार हो गया. उन्होंने उसको पूडी और छोले की थाली दी. थाली में एक पूड़ी और कुछ छोले थे, जैसे ही बुजुर्ग ने थाली में एक पूड़ी देखि तो बिना पूड़ी खाए हुए उन्होंने उस सज्जन से कहा कि मुझे तीन पूडियां और चाहिए. उस ब्यक्ति ने बड़े प्यार से उन बुजुर्ग से कहा कि आपको जितनी पूडिया चाहिए, आपको मिलेगी, आप बड़े आराम से खाईये. बाद में थीं और पूडियां उस बुजुर्ग की थाली में परोशी गई. दुकान दार को पैसे चुकाने के बाद वो सज्जन अपने गंतब्य की ओर प्रस्थान कर गया जबकि बुजुर्ग भोजन का स्वाद ले रहा था और अपनी भूख मिटा रहा था.
अब सवाल ये है कि क्या वो बुजुर्ग वास्तव में पागल था या भूख ने उसको पागलों जैसा बना दिया था. क्या उस दुकानदार का कहना बिल्कुल उचित था कि यदि इसको खाना देते है तो ये बार बार खाने की मांग करता है?. नही दोस्तों, सोचो यदि हम भूख से बहुत ब्याकुल है और यदि कोई हमें एक टुकडा रोटी को दे तो क्या वो एक रोटी को टुकडा हमारी भूख को तृप्त कर देगा? नही बल्कि वो हमारी भूख को और प्रज्जवलित करेगा जब तक कि हमें भरपेट भोजन न मिल जाय. वही स्तिथि उस बुजुर्ग की भी थी, यदि कोई उसे एक रोटी का टुकडा भी देता होगा तो उससे उसकी भूख शांत नही होती है, बल्कि और भी ज्यादा बदती होगी और इसीलिए वो बार बार खाने की मांग करता होगा. इसलिए दोस्तों मेरी नजर में पागल वो बुजुर्ग नही है, बल्कि उसकी भूख है, जिसने उसको पागलों जैसा बना दिया है. एक अकेला ही ऐसा बुजुर्ग नही है, आपको हजारों लाखों ऐसे कई लोग मिल जायेगे जो अपनी क्षुदा (भूख) पूर्ति करने के लिए पागलों की श्रेणी में गिने जाते है.
धन्य हो ऐसे पुत्र पुत्री जिन्होंने अपने माँ बाप को ऐसी अवस्था में छोड़ दिया है, उनके लिए मेरे पास शब्द नही है और अगर यदि उस बुजुर्ग के पास इस बुडापे के लिए कोई अपना सहारा ही नही है या था तो मैं भगवान् से यही प्रार्थना करूँगा कि हे भगवान् ना दीजो कभी किसी (मुझे) को ऐसा बुडापा.
तो दोस्तों क्या आप ऐसा बुडापा जीवन ब्यतीत करना चाहेंगे कि आपको २ जून की रोटी के लिए दर दर भटकना पड़े?
अब सवाल ये है कि क्या वो बुजुर्ग वास्तव में पागल था या भूख ने उसको पागलों जैसा बना दिया था. क्या उस दुकानदार का कहना बिल्कुल उचित था कि यदि इसको खाना देते है तो ये बार बार खाने की मांग करता है?. नही दोस्तों, सोचो यदि हम भूख से बहुत ब्याकुल है और यदि कोई हमें एक टुकडा रोटी को दे तो क्या वो एक रोटी को टुकडा हमारी भूख को तृप्त कर देगा? नही बल्कि वो हमारी भूख को और प्रज्जवलित करेगा जब तक कि हमें भरपेट भोजन न मिल जाय. वही स्तिथि उस बुजुर्ग की भी थी, यदि कोई उसे एक रोटी का टुकडा भी देता होगा तो उससे उसकी भूख शांत नही होती है, बल्कि और भी ज्यादा बदती होगी और इसीलिए वो बार बार खाने की मांग करता होगा. इसलिए दोस्तों मेरी नजर में पागल वो बुजुर्ग नही है, बल्कि उसकी भूख है, जिसने उसको पागलों जैसा बना दिया है. एक अकेला ही ऐसा बुजुर्ग नही है, आपको हजारों लाखों ऐसे कई लोग मिल जायेगे जो अपनी क्षुदा (भूख) पूर्ति करने के लिए पागलों की श्रेणी में गिने जाते है.
धन्य हो ऐसे पुत्र पुत्री जिन्होंने अपने माँ बाप को ऐसी अवस्था में छोड़ दिया है, उनके लिए मेरे पास शब्द नही है और अगर यदि उस बुजुर्ग के पास इस बुडापे के लिए कोई अपना सहारा ही नही है या था तो मैं भगवान् से यही प्रार्थना करूँगा कि हे भगवान् ना दीजो कभी किसी (मुझे) को ऐसा बुडापा.
तो दोस्तों क्या आप ऐसा बुडापा जीवन ब्यतीत करना चाहेंगे कि आपको २ जून की रोटी के लिए दर दर भटकना पड़े?
Friday, December 10, 2010
बिहार बाड़ पीडितों की सहायता करें
नमस्कार, जैसे कि आप लोगों को मालूम ही होगा कि बिहार में कोसी नदी में बाड आ जाने से वहा का जीवन अस्त-ब्यस्त हो गया है, लोगों के घर पानी में डूब गए है, फसलें नष्ट हो गई है, कई लोग अपनी जिंदगी गँवा चुके है और कई लोग जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे है. आशियाने डूब गए है, एक चलती फिरती जिंदगी अचानक सी रुक सी गई है, बिहार के बाड प्रभावित लोग कई प्रकार की परेशानियों से झूझ रहे है. इंसानियत के नाते हम लोगों को भी आज इस संकट की घड़ी में उन बाड प्रभावित लोगों के साथ उनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए. यदि हम शारीरिक रूप से उनका साथ नही दे सकते है, तो आर्थिक रूप से हम उनकी कुछ न कुछ मदद जरूर कर सकते है. मेरा ब्याक्तिगत हम सभी लोगों से निवेदन है कि हमें भी इस प्राकृतिक आपदा में उन लोगों का साथ देना चाहिए. जिससे जितनी आर्थिक सहायता हो सकती है कृपया सभी लोग आगे आयें और इस मुश्किल की घड़ी में उन लोगों का हमसफर बनें.
आपका एक छोटा सा प्रयास (सहायता ) किसी का जीने का सहारा बन सकता है.
सभी लोगों से निवेदन है कि अपने ऑफिस और आस पड़ोस में भी लोगों को बाड पीड़ित लोगों की मदद करने के लिए प्रेरित करें
आपका एक छोटा सा प्रयास (सहायता ) किसी का जीने का सहारा बन सकता है.
सभी लोगों से निवेदन है कि अपने ऑफिस और आस पड़ोस में भी लोगों को बाड पीड़ित लोगों की मदद करने के लिए प्रेरित करें
Wednesday, December 8, 2010
गिरते नैतिक मूल्य
क्यों आज हमारी युवा पीड़ी निरंतर खोती जा रही है अपने नैतिक मूल्य? इस विषय पर अक्सर बहुत बार चर्चा सुनने को मिलती है, टी वी न्यूज़ चैनल्स के माध्यम से और समाचार पत्रों के माध्यम से. अगर हम अपने परिवार को लेकर आगे बढें, अपने आस पड़ोस को लेकर आगे बढ़ें तो हम भी इस बात से जरूर इतेफाक रखेंगे कि आज की जो हमारी युवा पीड़ी है और जो युवा पीड़ी आ रही है, उसमे जरूर कही न कहीं नैतिक मूल्यों की कमी नजर आती है, जैसे नैतिक मूल्य हमारे पूर्वजों के थे, हमारे माता पिता के थे. ये जो आज की पीड़ी है जिसमे मैं भी आता हूँ जरूर कही न कही हम अपना नैतिक मूल्य खोते जा रहे है और ये दर नित प्रतिदिन बढती जा रही है. जो संस्कार हमारे पूर्वजों के थे वो संस्कार हम अपनी नई पीड़ी को देने में कामयाब नही हो पा रहे है और मेरी नजर में इसके दोषी भी हम ख़ुद है, हमारा परिवार है, हमारे माँ बाप है.
अगर मैं अपनी उम्र की युवा पीड़ी को उद्दहरण के तोर पर लेकर आगे बड़ों तो बचपन मैं दादा-दादियों द्वारा हमको अच्छी अच्छी से कहानियाँ सुनने को मिलती थी. कहते है कि जब बच्चा छोटा होता है तो उस समय उसका मस्तिष्क बिल्कुल शून्य होता है, आप उसको जैसे संस्कार और शिक्षा देंगे वो उसी राह पर आगे बढता है. अगर बाल्यकाल में बच्चे को ये शिक्षा दी जाती है कि बेटा चोरी करना बुरा काम है तो वो चोरी करने से पहले सो बार सोचेगा, क्योंकि उसको शिक्षा मिली हुई है कि चोरी करना बुरी बात है. बाल्यकाल में बच्चे को संस्कारित करने में घर के बुजुर्गों का, माता पिता का बहुत बड़ा हाथ होता है. जैसे मैंने कहा कि जब छोटे थे और गाँव के बुजुर्ग दादा-दादियों की संगत में कुछ पल ब्यतीत करते थे, तो वो हमको बहुत कुछ अच्छी अच्छी कहानियाँ सुनाया करते थे जिसका कुछ न कुछ प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क पर पड़ता था, उनमे से कुछ कहानिया प्रेरणादायी होती थी, कुछ परोपकारी होती थी, कुछ जीवों पर दया करने वाली होती थी, कुछ देवी देवितोँ की होती थी और कुछ क्षेत्रीय कहानिया होती थी और सबका उद्देश्य हमारे अन्दर अच्छे संस्कारों को डालने का होता था और जो कि हमें संस्कारित बनाए रखने में आज भी बहुत मदद करते है. आज भी यदि हमारे कदम अपने पथ से विचलित होने का प्रयास करते है तो वो पुरानी कही हुई बातें याद आज जाती है और जो हमें फ़िर से सही पथ पर ले जाने का प्रयास करती है.
मैंने किसी प्रत्रिका मैं पढ़ा था कि किसी ५ साल के बच्चे से किसी सम्मानीय ब्यक्ति ने दुर्गा माँ की फोटो की ओर इशारा करते हुए पूछा बेटा ये कोन है तो बच्चे का जवाब था लोयन वाली औरत, जो इस लोयन के ऊपर बैठी है, किसी दूसरे सम्मानीय ब्यक्ति ने गणेश भगवान् के बारे में पूछा तो बच्चा गणेश जी को...Elephant God.......संबोधित करते हुए पाया गया. अब बताओ इसमे उस बच्चे का कसूर ही क्या है? जब कभी भी उस परिवार के सदस्य ने उसको ये बताने की कोशिश नही की कि बेटा ये दुर्गा माता है जिनका वहां शेर है या ये गणेश भगवान् जी है जिनका मुह हाथी की सूंड जैसा होता है तो उसको कैसे पता चलता?
जब हम छोटे थे तो हमारे पास एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी जिनमे कि बहुत अच्छी अच्छी कहानिया होती थी जिनको पड़कर बहुत आनंद आता था और एक बार मन में उन जैसा बनने की तीव्र इच्छा होती थी, लेकिन शायद आजकल उस नैतिक शिक्षा की किताब का अर्थ ही बदल गया है, उसका कोई महत्व ही नही रह गया है. मुझे तो लग रहा है कि शायद आज वो नैतिक शिक्षा की किताब स्कूलों से गायब भी हो चुकी होगी.
आज आपके घरों में दुनिया भर की कोमिक्स का ढेर मिल जाएगा, कंप्यूटर गेम्स की दुनिया भर की सी डी मिल जाएँगी, फिल्मी गानों की दुनिया भर की कैसेट आपके बच्चे के कमरे में मिल जायेगी लेकिन सरदार भगत सिंह, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद आदि मनीषियों की प्रेरणा श्रोत कहानियो की किताब आपके बच्चे के स्कूल बैग से नदारद मिलेगी और यहाँ तक कि आप भी ये कोशिश कभी नही करेंगे कि आप अपने बच्चे को ऐसी किताबें खरीद कर लायें. पहले यदि हमारे माँ बाप ऐसी किताबें नही भी खरीदा करते थे तो इसकी कमी हमारे दादा-दादी और बुजुर्ग पूरा कर देते थे, लेकिन आज हमारे बुरुगों की क्या स्तिथि है ये हम सब लोग जानते है. आज हर माँ बाप की ये कोशिश रहती है कि उनके बच्चे उनके दादा-दादी से दूर रहे, यदि कभी दादा दादी ने बच्चे को डांटने की हिमाकत भी कर ली तो उल्टा उनको उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है.
शायद ही अब किसी बच्चे को वो दादा दादी की कहानिया सुनने को मिलती होंगी, वो लोरी वो गीत सुनने को मिलते होंगे और शायद न ही कोई माँ बाप के पास इतना समय है कि वो अपने बच्चे को संस्कारित होने के संस्कार दे सकें. आज महात्मा गांधी, भगत सिंह, विवेकनन्द, लाल बहादुर शास्त्री केवल या तो उनके जन्म दिवस के मोके पर ही याद किए जाते है या उनके निर्वाण दिवस पर, आज वो हमारे घरों से नदारद है, हमारे दादा-दादियों की कहानियो से नदारद है, हमारे माँ बाप की जुबान से बहुत दूर है, हमारे आस से दूर है और हमारे पड़ोस से दूर है. तो कैसे हम ये आशा कर सकते है कि हमारे बच्चों से अच्छे संस्कार आयें? अच्छे संस्कार देने के लिए हमारे पास तो समय नही है, जो उनको अच्छे संस्कार दे सकते थे उनको तो उपेक्षित किया जाता है, जिन पुस्तकों को पढने से उनको संस्कारित किया जा सकता है उनका स्थान कोमिक्स, खिलोने और कोम्प्टर गेम्स ने ले लिया है, तो कैसे हम ये आश कर सकते है.
इसके बारे में हमको ख़ुद सोचना चाहिए क्योंकि कल हमें भी किसी का माँ / बाप और दादा/दादी बनना है. हम ये निश्चय करते है कि हमारी संतान किस दिशा में जा रही है और हम उनको क्या संस्कार दे रहे है. इसका और कोई जिम्मेदार नही है, केवल हम ही है.
अगर मैं अपनी उम्र की युवा पीड़ी को उद्दहरण के तोर पर लेकर आगे बड़ों तो बचपन मैं दादा-दादियों द्वारा हमको अच्छी अच्छी से कहानियाँ सुनने को मिलती थी. कहते है कि जब बच्चा छोटा होता है तो उस समय उसका मस्तिष्क बिल्कुल शून्य होता है, आप उसको जैसे संस्कार और शिक्षा देंगे वो उसी राह पर आगे बढता है. अगर बाल्यकाल में बच्चे को ये शिक्षा दी जाती है कि बेटा चोरी करना बुरा काम है तो वो चोरी करने से पहले सो बार सोचेगा, क्योंकि उसको शिक्षा मिली हुई है कि चोरी करना बुरी बात है. बाल्यकाल में बच्चे को संस्कारित करने में घर के बुजुर्गों का, माता पिता का बहुत बड़ा हाथ होता है. जैसे मैंने कहा कि जब छोटे थे और गाँव के बुजुर्ग दादा-दादियों की संगत में कुछ पल ब्यतीत करते थे, तो वो हमको बहुत कुछ अच्छी अच्छी कहानियाँ सुनाया करते थे जिसका कुछ न कुछ प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क पर पड़ता था, उनमे से कुछ कहानिया प्रेरणादायी होती थी, कुछ परोपकारी होती थी, कुछ जीवों पर दया करने वाली होती थी, कुछ देवी देवितोँ की होती थी और कुछ क्षेत्रीय कहानिया होती थी और सबका उद्देश्य हमारे अन्दर अच्छे संस्कारों को डालने का होता था और जो कि हमें संस्कारित बनाए रखने में आज भी बहुत मदद करते है. आज भी यदि हमारे कदम अपने पथ से विचलित होने का प्रयास करते है तो वो पुरानी कही हुई बातें याद आज जाती है और जो हमें फ़िर से सही पथ पर ले जाने का प्रयास करती है.
मैंने किसी प्रत्रिका मैं पढ़ा था कि किसी ५ साल के बच्चे से किसी सम्मानीय ब्यक्ति ने दुर्गा माँ की फोटो की ओर इशारा करते हुए पूछा बेटा ये कोन है तो बच्चे का जवाब था लोयन वाली औरत, जो इस लोयन के ऊपर बैठी है, किसी दूसरे सम्मानीय ब्यक्ति ने गणेश भगवान् के बारे में पूछा तो बच्चा गणेश जी को...Elephant God.......संबोधित करते हुए पाया गया. अब बताओ इसमे उस बच्चे का कसूर ही क्या है? जब कभी भी उस परिवार के सदस्य ने उसको ये बताने की कोशिश नही की कि बेटा ये दुर्गा माता है जिनका वहां शेर है या ये गणेश भगवान् जी है जिनका मुह हाथी की सूंड जैसा होता है तो उसको कैसे पता चलता?
जब हम छोटे थे तो हमारे पास एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी जिनमे कि बहुत अच्छी अच्छी कहानिया होती थी जिनको पड़कर बहुत आनंद आता था और एक बार मन में उन जैसा बनने की तीव्र इच्छा होती थी, लेकिन शायद आजकल उस नैतिक शिक्षा की किताब का अर्थ ही बदल गया है, उसका कोई महत्व ही नही रह गया है. मुझे तो लग रहा है कि शायद आज वो नैतिक शिक्षा की किताब स्कूलों से गायब भी हो चुकी होगी.
आज आपके घरों में दुनिया भर की कोमिक्स का ढेर मिल जाएगा, कंप्यूटर गेम्स की दुनिया भर की सी डी मिल जाएँगी, फिल्मी गानों की दुनिया भर की कैसेट आपके बच्चे के कमरे में मिल जायेगी लेकिन सरदार भगत सिंह, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद आदि मनीषियों की प्रेरणा श्रोत कहानियो की किताब आपके बच्चे के स्कूल बैग से नदारद मिलेगी और यहाँ तक कि आप भी ये कोशिश कभी नही करेंगे कि आप अपने बच्चे को ऐसी किताबें खरीद कर लायें. पहले यदि हमारे माँ बाप ऐसी किताबें नही भी खरीदा करते थे तो इसकी कमी हमारे दादा-दादी और बुजुर्ग पूरा कर देते थे, लेकिन आज हमारे बुरुगों की क्या स्तिथि है ये हम सब लोग जानते है. आज हर माँ बाप की ये कोशिश रहती है कि उनके बच्चे उनके दादा-दादी से दूर रहे, यदि कभी दादा दादी ने बच्चे को डांटने की हिमाकत भी कर ली तो उल्टा उनको उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है.
शायद ही अब किसी बच्चे को वो दादा दादी की कहानिया सुनने को मिलती होंगी, वो लोरी वो गीत सुनने को मिलते होंगे और शायद न ही कोई माँ बाप के पास इतना समय है कि वो अपने बच्चे को संस्कारित होने के संस्कार दे सकें. आज महात्मा गांधी, भगत सिंह, विवेकनन्द, लाल बहादुर शास्त्री केवल या तो उनके जन्म दिवस के मोके पर ही याद किए जाते है या उनके निर्वाण दिवस पर, आज वो हमारे घरों से नदारद है, हमारे दादा-दादियों की कहानियो से नदारद है, हमारे माँ बाप की जुबान से बहुत दूर है, हमारे आस से दूर है और हमारे पड़ोस से दूर है. तो कैसे हम ये आशा कर सकते है कि हमारे बच्चों से अच्छे संस्कार आयें? अच्छे संस्कार देने के लिए हमारे पास तो समय नही है, जो उनको अच्छे संस्कार दे सकते थे उनको तो उपेक्षित किया जाता है, जिन पुस्तकों को पढने से उनको संस्कारित किया जा सकता है उनका स्थान कोमिक्स, खिलोने और कोम्प्टर गेम्स ने ले लिया है, तो कैसे हम ये आश कर सकते है.
इसके बारे में हमको ख़ुद सोचना चाहिए क्योंकि कल हमें भी किसी का माँ / बाप और दादा/दादी बनना है. हम ये निश्चय करते है कि हमारी संतान किस दिशा में जा रही है और हम उनको क्या संस्कार दे रहे है. इसका और कोई जिम्मेदार नही है, केवल हम ही है.
Monday, December 6, 2010
क्या यही पशु प्रेम है ??
दोस्तो कुछ दिन पहले मेरी नजर किसी दैनिक समाचार पत्र पर पढी, समाचार पढने के लिए मेरी थोडी इच्छा जाग्रत हुई, मैं समाचार पत्र पढने लग गया. समाचार संबंधित था एक कुत्ते के बारे मे,जो अपने मालिक को आज लाखों की महीने की आमदनी दे रहा है, दोस्तो ये और कोई कुत्ता नही है, वही है जिसको आप लोग हमेशा विभिन टी वी चैनल्स में विज्ञापन करते हुए देखते आ रहे है, हाँ दोस्तो वही वोडाफोन वाला कुत्ता. समाचार मे मैं आगे क्या पढता हूँ कि किसी एक पशु प्रेमी स्वयम संस्था ने वोडाफोन कंपनी वालों के इस विज्ञापन पर अदालत मे मुकदमा दायर कर दिया है. स्वयं सेवी संस्था ने कंपनी पर कुत्ते को उत्प्रीरण करने का आरोप लगाया है. स्वयं सेवी संस्था कहती है कि जब उन्होंने इस विज्ञापन का फिल्माकन किया होगा उस समय कुत्ते को बहुत तकलीफ हुई होगी. दोस्तो मैं उसी स्वयं सेवी संस्था से पूछना चाहता हूँ तब उनका पशु प्रेम कहा गया जब हजारों कुत्ते आए दिन गली मोहलों मे एक टुकड़े रोटी के लिए भटकते रहते है, एक टुकड़े रोटी के लिए अपने आप में लड़ते रहते है, कोई किसी बीमारी से संक्रमित है तो कोई किसी बीमारी से. किसी पर मखियाँ भिन भिना रही है तो कोई किसी गंदे नाले मे अपनी प्यास बुझा रहा है. तब उनका पशु प्रेम कहा गया? तब उनको उनकी पीड़ा नही महसूस हो रही है. ऐसे ही हजारों पालतू पशु हमारी गली गलियों में घुमते हुए नजर आते रहते है. क्या उन्होंने कभी उनके लिए आवाज उठाई?
अरे आज वो उस कुत्ते की बात कर रहे है जो अपने मालिक के घर मे चारपाई और रजाई के अन्दर सोता है, जो खुशबू दार साबुन से नहाता है, जो वो भोजन करता है जो हम जैसे सामान्य परिवार के लोग नही कर पाते है, उसके लिए करुना भाव का पैदा होना, थोड़ा सा आश्चर्यजनक लगता है.
दोस्तो हो सकता है मैं अपने आप में ग़लत हूँ, मेरे सोचने का तरीका ग़लत हो, लेकिन में उन पशु प्रेमी संस्थाओं से कहना चाहता हूँ कि अगर सच्चे अर्थों में तुमको हमारे पालतू पशुओं की चिंता है तो सबसे पहले उनकी
अरे आज वो उस कुत्ते की बात कर रहे है जो अपने मालिक के घर मे चारपाई और रजाई के अन्दर सोता है, जो खुशबू दार साबुन से नहाता है, जो वो भोजन करता है जो हम जैसे सामान्य परिवार के लोग नही कर पाते है, उसके लिए करुना भाव का पैदा होना, थोड़ा सा आश्चर्यजनक लगता है.
दोस्तो हो सकता है मैं अपने आप में ग़लत हूँ, मेरे सोचने का तरीका ग़लत हो, लेकिन में उन पशु प्रेमी संस्थाओं से कहना चाहता हूँ कि अगर सच्चे अर्थों में तुमको हमारे पालतू पशुओं की चिंता है तो सबसे पहले उनकी
Saturday, December 4, 2010
क्या उत्तर पुस्तिका सार्वजनिक होनी चाहिए
दोस्तो एजुकेशन और कैरियर हमारे जीवन का एक मह्त्वापूर्ण अंग है जो कि हमारा भविष्य तय करते है. सोचो यदि कोई हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ करे तो इसका परिणाम क्या हो सकता है, हम ख़ुद इसका अंदाजा लगा सकते है.
दोस्तो बहुत समय सुनने को मिलता है जब कई विद्यार्थी और अन्य प्रतियोगी कहते है कि मेरा फलाना पेपर / परीछा तो बहुत अच्छा गया था, मुझे तो पूरी उमीद थी पास होने की, अच्छे नम्बर आने की फ़िर भी मैं पास नही हुआ या मेरी अच्छी नम्बर नही आयी. मैं मात्र १ या २ नंबर्स से पीछे रहा गया. इस प्रकार के विभिन प्रश्न हमारे मन मस्तिष्क में घुमते रहते है. आख़िर ऐसा क्योँ हुआ? हम इसका कारन ढूढने की कोशिश तो करते है लेकिन कुछ कर नही सकते.
दोस्तो वैसे कोई भी एक्साम या प्रतियोगिता पास करना हमारी अपनी मेहनत पर निर्भर करता है, जैसी हम मेहनत करेंगे वैसा ही हमको परिणाम मिलेगा, लेकिन कभी कभी हम मेहनत तो पूरी करते है लेकिन उसके अनुसार हमको परिणाम प्राप्त नही होता है. क्योँ हमको इसके अनुसार परिणाम प्राप्त नही होता है, इसके कई दोषी हो सकते है
बहुत बार सुनने को मिलता है कि फलाना बोर्ड की कॉपियाँ कूड़े के ढेर में मिली या अध्यापक के बच्चों को कॉपियाँ जांचते हुए पाया गया या पैसे देकर फलाने ने परीछा में टॉप किया या पैसे में डिग्री खरीदी गई. इस प्रकार की कई खबरें अक्सर सुनने को मिलती है. इसका परिणाम कोण भुगतेगा?
दोस्तो मेरा मुख्य विन्दु यह है कि क्या किसी भी परीक्षा या प्रतियोगिता परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिका प्रतियोगी को आवश्यकता पड़ने पर दिखाई देनी चाहिए? क्या अब ऐसा समय आ गया है जब हमको इस प्रकार के कानून की आवश्यकता हो गई है ? क्या हमको ऐसा अधिकार मिलना चाहिए कि हम अपनी उत्तर पुस्तिका का स्वयं मूल्यांकन परिणाम घोषित होने के बाद कर सकें ?
दोस्तो यदि कोई ऐसा कानून बनता है तो निश्चित ही इसके कई धनात्मक प्रभाव हमारे समाज और सरकारी, निजी तंत्र में देखने को मिलेंगे. सबसे पहला जो लाभ मिलेगा वो है पारदर्शिता की. दूसरा लाभ भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है, कैसे मिल सकती है , ये बात आप खुद सोच समझ सकते है. इसमे मुझे ज्यादा कुछ लिखने की जरूरत नही है .
मेरा यहा पर लिखने का एक मात्र उद्देश्य यह है कि मैं आप लोगों के विचार भी जानना चाहता हूँ कि क्या वास्तव मे हमको एक ऐसे कानून की जरूरत है, जो हमारे आने वाली युवा पीढ़ी को या हमारे उन प्रतियोगी भाई-बहिनों को ये अधिकार दे कि वे अपने प्रतियोगी परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं का स्वयं मूल्यांकन कर सके आवश्यकता पड़ने पर.
दोस्तो बहुत समय सुनने को मिलता है जब कई विद्यार्थी और अन्य प्रतियोगी कहते है कि मेरा फलाना पेपर / परीछा तो बहुत अच्छा गया था, मुझे तो पूरी उमीद थी पास होने की, अच्छे नम्बर आने की फ़िर भी मैं पास नही हुआ या मेरी अच्छी नम्बर नही आयी. मैं मात्र १ या २ नंबर्स से पीछे रहा गया. इस प्रकार के विभिन प्रश्न हमारे मन मस्तिष्क में घुमते रहते है. आख़िर ऐसा क्योँ हुआ? हम इसका कारन ढूढने की कोशिश तो करते है लेकिन कुछ कर नही सकते.
दोस्तो वैसे कोई भी एक्साम या प्रतियोगिता पास करना हमारी अपनी मेहनत पर निर्भर करता है, जैसी हम मेहनत करेंगे वैसा ही हमको परिणाम मिलेगा, लेकिन कभी कभी हम मेहनत तो पूरी करते है लेकिन उसके अनुसार हमको परिणाम प्राप्त नही होता है. क्योँ हमको इसके अनुसार परिणाम प्राप्त नही होता है, इसके कई दोषी हो सकते है
बहुत बार सुनने को मिलता है कि फलाना बोर्ड की कॉपियाँ कूड़े के ढेर में मिली या अध्यापक के बच्चों को कॉपियाँ जांचते हुए पाया गया या पैसे देकर फलाने ने परीछा में टॉप किया या पैसे में डिग्री खरीदी गई. इस प्रकार की कई खबरें अक्सर सुनने को मिलती है. इसका परिणाम कोण भुगतेगा?
दोस्तो मेरा मुख्य विन्दु यह है कि क्या किसी भी परीक्षा या प्रतियोगिता परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिका प्रतियोगी को आवश्यकता पड़ने पर दिखाई देनी चाहिए? क्या अब ऐसा समय आ गया है जब हमको इस प्रकार के कानून की आवश्यकता हो गई है ? क्या हमको ऐसा अधिकार मिलना चाहिए कि हम अपनी उत्तर पुस्तिका का स्वयं मूल्यांकन परिणाम घोषित होने के बाद कर सकें ?
दोस्तो यदि कोई ऐसा कानून बनता है तो निश्चित ही इसके कई धनात्मक प्रभाव हमारे समाज और सरकारी, निजी तंत्र में देखने को मिलेंगे. सबसे पहला जो लाभ मिलेगा वो है पारदर्शिता की. दूसरा लाभ भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है, कैसे मिल सकती है , ये बात आप खुद सोच समझ सकते है. इसमे मुझे ज्यादा कुछ लिखने की जरूरत नही है .
मेरा यहा पर लिखने का एक मात्र उद्देश्य यह है कि मैं आप लोगों के विचार भी जानना चाहता हूँ कि क्या वास्तव मे हमको एक ऐसे कानून की जरूरत है, जो हमारे आने वाली युवा पीढ़ी को या हमारे उन प्रतियोगी भाई-बहिनों को ये अधिकार दे कि वे अपने प्रतियोगी परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं का स्वयं मूल्यांकन कर सके आवश्यकता पड़ने पर.
Thursday, December 2, 2010
गिरते नैतिक मूल्य
क्यों आज हमारी युवा पीड़ी निरंतर खोती जा रही है अपने नैतिक मूल्य? इस विषय पर अक्सर बहुत बार चर्चा सुनने को मिलती है, टी वी न्यूज़ चैनल्स के माध्यम से और समाचार पत्रों के माध्यम से. अगर हम अपने परिवार को लेकर आगे बढें, अपने आस पड़ोस को लेकर आगे बढ़ें तो हम भी इस बात से जरूर इतेफाक रखेंगे कि आज की जो हमारी युवा पीड़ी है और जो युवा पीड़ी आ रही है, उसमे जरूर कही न कहीं नैतिक मूल्यों की कमी नजर आती है, जैसे नैतिक मूल्य हमारे पूर्वजों के थे, हमारे माता पिता के थे. ये जो आज की पीड़ी है जिसमे मैं भी आता हूँ जरूर कही न कही हम अपना नैतिक मूल्य खोते जा रहे है और ये दर नित प्रतिदिन बढती जा रही है. जो संस्कार हमारे पूर्वजों के थे वो संस्कार हम अपनी नई पीड़ी को देने में कामयाब नही हो पा रहे है और मेरी नजर में इसके दोषी भी हम ख़ुद है, हमारा परिवार है, हमारे माँ बाप है.
अगर मैं अपनी उम्र की युवा पीड़ी को उद्दहरण के तोर पर लेकर आगे बड़ों तो बचपन मैं दादा-दादियों द्वारा हमको अच्छी अच्छी से कहानियाँ सुनने को मिलती थी. कहते है कि जब बच्चा छोटा होता है तो उस समय उसका मस्तिष्क बिल्कुल शून्य होता है, आप उसको जैसे संस्कार और शिक्षा देंगे वो उसी राह पर आगे बढता है. अगर बाल्यकाल में बच्चे को ये शिक्षा दी जाती है कि बेटा चोरी करना बुरा काम है तो वो चोरी करने से पहले सो बार सोचेगा, क्योंकि उसको शिक्षा मिली हुई है कि चोरी करना बुरी बात है. बाल्यकाल में बच्चे को संस्कारित करने में घर के बुजुर्गों का, माता पिता का बहुत बड़ा हाथ होता है. जैसे मैंने कहा कि जब छोटे थे और गाँव के बुजुर्ग दादा-दादियों की संगत में कुछ पल ब्यतीत करते थे, तो वो हमको बहुत कुछ अच्छी अच्छी कहानियाँ सुनाया करते थे जिसका कुछ न कुछ प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क पर पड़ता था, उनमे से कुछ कहानिया प्रेरणादायी होती थी, कुछ परोपकारी होती थी, कुछ जीवों पर दया करने वाली होती थी, कुछ देवी देवितोँ की होती थी और कुछ क्षेत्रीय कहानिया होती थी और सबका उद्देश्य हमारे अन्दर अच्छे संस्कारों को डालने का होता था और जो कि हमें संस्कारित बनाए रखने में आज भी बहुत मदद करते है. आज भी यदि हमारे कदम अपने पथ से विचलित होने का प्रयास करते है तो वो पुरानी कही हुई बातें याद आज जाती है और जो हमें फ़िर से सही पथ पर ले जाने का प्रयास करती है.
मैंने किसी प्रत्रिका मैं पढ़ा था कि किसी ५ साल के बच्चे से किसी सम्मानीय ब्यक्ति ने दुर्गा माँ की फोटो की ओर इशारा करते हुए पूछा बेटा ये कोन है तो बच्चे का जवाब था लोयन वाली औरत, जो इस लोयन के ऊपर बैठी है, किसी दूसरे सम्मानीय ब्यक्ति ने गणेश भगवान् के बारे में पूछा तो बच्चा गणेश जी को...Elephant God.......संबोधित करते हुए पाया गया. अब बताओ इसमे उस बच्चे का कसूर ही क्या है? जब कभी भी उस परिवार के सदस्य ने उसको ये बताने की कोशिश नही की कि बेटा ये दुर्गा माता है जिनका वहां शेर है या ये गणेश भगवान् जी है जिनका मुह हाथी की सूंड जैसा होता है तो उसको कैसे पता चलता?
जब हम छोटे थे तो हमारे पास एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी जिनमे कि बहुत अच्छी अच्छी कहानिया होती थी जिनको पड़कर बहुत आनंद आता था और एक बार मन में उन जैसा बनने की तीव्र इच्छा होती थी, लेकिन शायद आजकल उस नैतिक शिक्षा की किताब का अर्थ ही बदल गया है, उसका कोई महत्व ही नही रह गया है. मुझे तो लग रहा है कि शायद आज वो नैतिक शिक्षा की किताब स्कूलों से गायब भी हो चुकी होगी.
आज आपके घरों में दुनिया भर की कोमिक्स का ढेर मिल जाएगा, कंप्यूटर गेम्स की दुनिया भर की सी डी मिल जाएँगी, फिल्मी गानों की दुनिया भर की कैसेट आपके बच्चे के कमरे में मिल जायेगी लेकिन सरदार भगत सिंह, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद आदि मनीषियों की प्रेरणा श्रोत कहानियो की किताब आपके बच्चे के स्कूल बैग से नदारद मिलेगी और यहाँ तक कि आप भी ये कोशिश कभी नही करेंगे कि आप अपने बच्चे को ऐसी किताबें खरीद कर लायें. पहले यदि हमारे माँ बाप ऐसी किताबें नही भी खरीदा करते थे तो इसकी कमी हमारे दादा-दादी और बुजुर्ग पूरा कर देते थे, लेकिन आज हमारे बुरुगों की क्या स्तिथि है ये हम सब लोग जानते है. आज हर माँ बाप की ये कोशिश रहती है कि उनके बच्चे उनके दादा-दादी से दूर रहे, यदि कभी दादा दादी ने बच्चे को डांटने की हिमाकत भी कर ली तो उल्टा उनको उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है.
शायद ही अब किसी बच्चे को वो दादा दादी की कहानिया सुनने को मिलती होंगी, वो लोरी वो गीत सुनने को मिलते होंगे और शायद न ही कोई माँ बाप के पास इतना समय है कि वो अपने बच्चे को संस्कारित होने के संस्कार दे सकें. आज महात्मा गांधी, भगत सिंह, विवेकनन्द, लाल बहादुर शास्त्री केवल या तो उनके जन्म दिवस के मोके पर ही याद किए जाते है या उनके निर्वाण दिवस पर, आज वो हमारे घरों से नदारद है, हमारे दादा-दादियों की कहानियो से नदारद है, हमारे माँ बाप की जुबान से बहुत दूर है, हमारे आस से दूर है और हमारे पड़ोस से दूर है. तो कैसे हम ये आशा कर सकते है कि हमारे बच्चों से अच्छे संस्कार आयें? अच्छे संस्कार देने के लिए हमारे पास तो समय नही है, जो उनको अच्छे संस्कार दे सकते थे उनको तो उपेक्षित किया जाता है, जिन पुस्तकों को पढने से उनको संस्कारित किया जा सकता है उनका स्थान कोमिक्स, खिलोने और कोम्प्टर गेम्स ने ले लिया है, तो कैसे हम ये आश कर सकते है.
इसके बारे में हमको ख़ुद सोचना चाहिए क्योंकि कल हमें भी किसी का माँ / बाप और दादा/दादी बनना है. हम ये निश्चय करते है कि हमारी संतान किस दिशा में जा रही है और हम उनको क्या संस्कार दे रहे है. इसका और कोई जिम्मेदार नही है, केवल हम ही है.
अगर मैं अपनी उम्र की युवा पीड़ी को उद्दहरण के तोर पर लेकर आगे बड़ों तो बचपन मैं दादा-दादियों द्वारा हमको अच्छी अच्छी से कहानियाँ सुनने को मिलती थी. कहते है कि जब बच्चा छोटा होता है तो उस समय उसका मस्तिष्क बिल्कुल शून्य होता है, आप उसको जैसे संस्कार और शिक्षा देंगे वो उसी राह पर आगे बढता है. अगर बाल्यकाल में बच्चे को ये शिक्षा दी जाती है कि बेटा चोरी करना बुरा काम है तो वो चोरी करने से पहले सो बार सोचेगा, क्योंकि उसको शिक्षा मिली हुई है कि चोरी करना बुरी बात है. बाल्यकाल में बच्चे को संस्कारित करने में घर के बुजुर्गों का, माता पिता का बहुत बड़ा हाथ होता है. जैसे मैंने कहा कि जब छोटे थे और गाँव के बुजुर्ग दादा-दादियों की संगत में कुछ पल ब्यतीत करते थे, तो वो हमको बहुत कुछ अच्छी अच्छी कहानियाँ सुनाया करते थे जिसका कुछ न कुछ प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क पर पड़ता था, उनमे से कुछ कहानिया प्रेरणादायी होती थी, कुछ परोपकारी होती थी, कुछ जीवों पर दया करने वाली होती थी, कुछ देवी देवितोँ की होती थी और कुछ क्षेत्रीय कहानिया होती थी और सबका उद्देश्य हमारे अन्दर अच्छे संस्कारों को डालने का होता था और जो कि हमें संस्कारित बनाए रखने में आज भी बहुत मदद करते है. आज भी यदि हमारे कदम अपने पथ से विचलित होने का प्रयास करते है तो वो पुरानी कही हुई बातें याद आज जाती है और जो हमें फ़िर से सही पथ पर ले जाने का प्रयास करती है.
मैंने किसी प्रत्रिका मैं पढ़ा था कि किसी ५ साल के बच्चे से किसी सम्मानीय ब्यक्ति ने दुर्गा माँ की फोटो की ओर इशारा करते हुए पूछा बेटा ये कोन है तो बच्चे का जवाब था लोयन वाली औरत, जो इस लोयन के ऊपर बैठी है, किसी दूसरे सम्मानीय ब्यक्ति ने गणेश भगवान् के बारे में पूछा तो बच्चा गणेश जी को...Elephant God.......संबोधित करते हुए पाया गया. अब बताओ इसमे उस बच्चे का कसूर ही क्या है? जब कभी भी उस परिवार के सदस्य ने उसको ये बताने की कोशिश नही की कि बेटा ये दुर्गा माता है जिनका वहां शेर है या ये गणेश भगवान् जी है जिनका मुह हाथी की सूंड जैसा होता है तो उसको कैसे पता चलता?
जब हम छोटे थे तो हमारे पास एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी जिनमे कि बहुत अच्छी अच्छी कहानिया होती थी जिनको पड़कर बहुत आनंद आता था और एक बार मन में उन जैसा बनने की तीव्र इच्छा होती थी, लेकिन शायद आजकल उस नैतिक शिक्षा की किताब का अर्थ ही बदल गया है, उसका कोई महत्व ही नही रह गया है. मुझे तो लग रहा है कि शायद आज वो नैतिक शिक्षा की किताब स्कूलों से गायब भी हो चुकी होगी.
आज आपके घरों में दुनिया भर की कोमिक्स का ढेर मिल जाएगा, कंप्यूटर गेम्स की दुनिया भर की सी डी मिल जाएँगी, फिल्मी गानों की दुनिया भर की कैसेट आपके बच्चे के कमरे में मिल जायेगी लेकिन सरदार भगत सिंह, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद आदि मनीषियों की प्रेरणा श्रोत कहानियो की किताब आपके बच्चे के स्कूल बैग से नदारद मिलेगी और यहाँ तक कि आप भी ये कोशिश कभी नही करेंगे कि आप अपने बच्चे को ऐसी किताबें खरीद कर लायें. पहले यदि हमारे माँ बाप ऐसी किताबें नही भी खरीदा करते थे तो इसकी कमी हमारे दादा-दादी और बुजुर्ग पूरा कर देते थे, लेकिन आज हमारे बुरुगों की क्या स्तिथि है ये हम सब लोग जानते है. आज हर माँ बाप की ये कोशिश रहती है कि उनके बच्चे उनके दादा-दादी से दूर रहे, यदि कभी दादा दादी ने बच्चे को डांटने की हिमाकत भी कर ली तो उल्टा उनको उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है.
शायद ही अब किसी बच्चे को वो दादा दादी की कहानिया सुनने को मिलती होंगी, वो लोरी वो गीत सुनने को मिलते होंगे और शायद न ही कोई माँ बाप के पास इतना समय है कि वो अपने बच्चे को संस्कारित होने के संस्कार दे सकें. आज महात्मा गांधी, भगत सिंह, विवेकनन्द, लाल बहादुर शास्त्री केवल या तो उनके जन्म दिवस के मोके पर ही याद किए जाते है या उनके निर्वाण दिवस पर, आज वो हमारे घरों से नदारद है, हमारे दादा-दादियों की कहानियो से नदारद है, हमारे माँ बाप की जुबान से बहुत दूर है, हमारे आस से दूर है और हमारे पड़ोस से दूर है. तो कैसे हम ये आशा कर सकते है कि हमारे बच्चों से अच्छे संस्कार आयें? अच्छे संस्कार देने के लिए हमारे पास तो समय नही है, जो उनको अच्छे संस्कार दे सकते थे उनको तो उपेक्षित किया जाता है, जिन पुस्तकों को पढने से उनको संस्कारित किया जा सकता है उनका स्थान कोमिक्स, खिलोने और कोम्प्टर गेम्स ने ले लिया है, तो कैसे हम ये आश कर सकते है.
इसके बारे में हमको ख़ुद सोचना चाहिए क्योंकि कल हमें भी किसी का माँ / बाप और दादा/दादी बनना है. हम ये निश्चय करते है कि हमारी संतान किस दिशा में जा रही है और हम उनको क्या संस्कार दे रहे है. इसका और कोई जिम्मेदार नही है, केवल हम ही है.
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